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“भाषण लंबा, तैयारी छोटी: ऊर्जा संकट ने खोल दी सरकार की पोल?”

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Spot TV/ Rajesh Kumar: आज की तारीख में मध्यपूर्व में बढ़ते तनाव खासकर Iran, Israel और अमेरिका के बीच टकराव ने पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को अस्थिर कर दिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारा भारत इस संकट के लिए तैयार था, या सिर्फ भरोसे और भाषण पर देश को चलाया जा रहा था?

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने संसद में 35 मिनट का भाषण दिया। उन्होंने धैर्य रखने की अपील की, लेकिन यह नहीं बताया कि अगर गैस और तेल की सप्लाई रुक गई तो देश कितने दिन चल पाएगा।

सच्चाई यह है कि भारत अपनी जरूरत का 60% से अधिक LPG आयात करता है, और उसका 80–85% हिस्सा Strait of Hormuz के रास्ते से आता है जो युद्ध की स्थिति में सबसे संवेदनशील मार्ग है।

मेरा सवाल यह कि- क्या सरकार ने कभी सोचा कि अगर यह रास्ता बंद हो गया तो देश की रसोई कैसे चलेगी?

विदेश नीति की चूक या रणनीति की कमी?

आपको याद होगा पिछले दिनों सरकार बार-बार कहती रही है- कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता हो रहा है, इसलिए उपभोक्ताओं से ज्यादा कीमत ली जा रही है ताकि “बुरे दिन” में काम आए। लेकिन अब जब बुरे दिन आए हैं, तो देश को सिर्फ धैर्य रखने की सलाह दी जा रही है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है- अगर तैयारी थी, तो संकट की आशंका होते ही कीमतें और आपूर्ति क्यों अस्थिर हो गई?

अमेरिका का दबाव और भारत की मजबूरी!

2019 में जब Iran पर प्रतिबंध लगे, तो भारत को वहां से तेल खरीदना बंद करना पड़ा। यह घटना दिखाती है कि वैश्विक राजनीति में भारत की ऊर्जा नीति कितनी स्वतंत्र है। आज भी यह आशंका बनी हुई है कि अगर United States या उसके सहयोगी देश कोई नया प्रतिबंध लगाते हैं, तो भारत को अपने व्यापारिक फैसले बदलने पड़ सकते हैं। पिछले दिनों अमेरिका से ट्रेड डील के दौरान हमसब ने देखा। अब अमेरिका तय करता है कि हमें किससे और कब तेल लेना है और कब नहीं?

140 करोड़ की आबादी वाला देश अगर अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरों के फैसलों पर निर्भर हो जाए, तो यह केवल आर्थिक नहीं, रणनीतिक कमजोरी भी है। जरा आंकड़ों के नजरिए से देखते हैं कि भारत की ऊर्जा निर्भरता कितनी है-

LPG उपभोक्ता: लगभग 33 करोड़

दैनिक सिलिंडर बुकिंग: 40–50 लाख

आयात निर्भरता: 60%+

भंडारण क्षमता: लगभग 15–20 दिन

अब यदि नई सप्लाई कुछ समय के लिए बाधित होती है, तो देश में आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है, हालांकि तत्काल संकट की संभावना कम है।

गिरता रुपया: चेतावनी की घंटी

जब मध्यपूर्व में तनाव बढ़ता है, तो तेल महंगा होता है और भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इसका सीधा असर रुपये पर पड़ता है और वह कमजोर हो जाता है। यह केवल बाजार का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर है।

सरकार की प्रतिक्रिया

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने संसद में कहा कि स्थिति चुनौतीपूर्ण है, लेकिन देश के पास पर्याप्त संसाधन हैं और घबराने की जरूरत नहीं है। सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि आपूर्ति बनाए रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों और रणनीतिक भंडार का उपयोग किया जा सकता है।

यहां एक बात तो स्पष्ट हो गई कि- ऊर्जा संकट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत ने अपनी ऊर्जा और विदेश नीति को पर्याप्त मजबूत बनाया है? अगर भविष्य में ऐसे संकटों से बचना है, तो सरकार को केवल भाषण नहीं, बल्कि ठोस तैयारी दिखानी होगी।

जैसे:

घरेलू उत्पादन बढ़ाना।

वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विस्तार।

60–90 दिन का रणनीतिक भंडार बनाना।

ऊर्जा आयात के स्रोतों का विविधीकरण।

वरना हर वैश्विक संकट में भारत को फिर वही सवाल सुनना पड़ेगा- “क्या तैयारी थी?”
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