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“नीतीश-लालू युग का अंत! अब कौन बदलेगा बिहार की किस्मत?”-“नीतीश-लालू युग का अंत! अब कौन बदलेगा बिहार की किस्मत?”-“नीतीश-लालू युग का अंत! अब कौन बदलेगा बिहार की किस्मत?”-“नीतीश-लालू युग का अंत! अब कौन बदलेगा बिहार की किस्मत?”-“नीतीश-लालू युग का अंत! अब कौन बदलेगा बिहार की किस्मत?”-BJP ने सीएम नीतीश कुमार को इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया: आदित्य पासवान-BJP ने सीएम नीतीश कुमार को इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया: आदित्य पासवान-BJP ने सीएम नीतीश कुमार को इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया: आदित्य पासवान-BJP ने सीएम नीतीश कुमार को इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया: आदित्य पासवान-BJP ने सीएम नीतीश कुमार को इतिहास के कूड़ेदान में डाल दिया: आदित्य पासवान

“नीतीश-लालू युग का अंत! अब कौन बदलेगा बिहार की किस्मत?”

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ततततत

Headline

  • जेपी आंदोलन की आखिरी कड़ी खत्म: नए बिहार का नेता कौन?
  • 21 साल बाद भी बिहार गरीब क्यों है? अब किसके पास है विजन?
  • नीतीश के बाद का बिहार: क्या नई पीढ़ी दे पाएगी विकास का मॉडल?
  • बिहार में बदलते राजनीतिक दौर: कौन बनेगा नए युग का नेता?

Patna,Rajesh Kumar: नीतीश कुमार अब बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अब वो एक बार फिर केंद्र की राजनीति करेंगे। लेकिन इसके साथ ही सूबे में ये चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या जो अब मुख्यमंत्री बनेगा वो बिहार को विकास की राह पर ले जा पाएगा?

देखिए बिहार की राजनीति एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है। पिछले तीन दशकों में राज्य की राजनीति मुख्य रूप से चार नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही- नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और सुशील कुमार मोदी।

इनमें से दो नेता अब हमारे बीच नहीं हैं और दो की राजनीतिक भूमिका सीमित होती जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बिहार एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर रहा है? और यदि हां, तो उस युग का नेतृत्व कौन करेगा? इस मसले पर हम विचार करें उससे पहले हमलोग को पूर्व की स्थिति में झांकना होगा।

लालू-राबड़ी राज में बिहार की स्थिति

वर्ष 1990 से 2005 तक बिहार में मुख्य रूप से लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी राजद का शासन रहा। अब जरा 2005 में सत्ता परिवर्तन के समय बिहार की स्थिति कैसी थी इस पर नजर डालते हैं।

अपराध की घटनाओं को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा।

शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए बड़े पैमाने पर पलायन।

औद्योगिक निवेश लगभग शून्य।

प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे कम।

सुशासन राज: उपलब्धियां और सीमाएं

बिहार की इसी खुरदरी भूमि पर 2005 में नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली।

नीतीश कुमार को सत्ता संभालते समय जिस बिहार का सामना करना पड़ा, उसमें बुनियादी ढांचा लगभग ठप था।

उनके कार्यकाल में कुछ प्रमुख बदलाव हुए जो राज्य की तस्वीर बदलने में मुख्य भूमिका अदा की।

बिहार में सुशासन का राज कायम।

सड़क नेटवर्क का तेजी से विस्तार।

बिजली उत्पादन और आपूर्ति में सुधार।

पंचायत स्तर पर महिला आरक्षण।

साइकिल-पोशान और छात्रवृत्ति जैसी शिक्षा योजनाएं।

लेकिन 21 वर्षों के लंबे शासन के बावजूद नीतीश कुमार राज्य की मूल आर्थिक संरचना में बड़ा बदलाव नहीं कर पाए।

आज भी बिहार की प्रमुख चुनौतियां मुंह बाए खड़ी है

देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय।

बड़े पैमाने पर मजदूरों का पलायन।

उद्योगों का अभाव।

उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भरता।

भ्रष्टाचार और अफसरशाही चरम पर।

नई पीढ़ी के नेता: क्या इनके पास विजन है?

अब सवाल यह है कि आने वाले समय में बिहार का नेतृत्व कौन करेगा।

संभावित चेहरे की बात की जाए तो-

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र ई. निशांत कुमार जो अब सक्रिय राजनीति में कदम रख चुके हैं। लेकिन मुझे लगता है अभी उन पर कोई भी टीका टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी। थोड़ा इंतजार करना होगा।

सम्राट चौधरी

भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में से एक हैं। वर्तमान में उप मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं। संगठनात्मक राजनीति में पकड़ है।

तेजस्वी यादव

राष्ट्रीय जनता दल के नेता हैं। रोजगार और युवाओं के मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं। हालांकि इस बार के विधानसभा चुनाव के रिजल्ट उनके खिलाफ रहे।

चिराग पासवान

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता हैं। खुद को युवा विकासवादी चेहरा बताते हैं। विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया है।

प्रशांत किशोर

विजन भी है और मेहनती भी हैं। साथ ही बिहार कि बुनियादी समस्याओं की समझ भी है। लेकिन इस बार जनता का समर्थन नहीं मिल पाया विधानसभा चुनाव में। मुद्दों की राजनीति करने में सभी पर भारी पड़ते हैं।

असली चुनौती क्या है?

मेरा मानना है कि बिहार के सामने पांच बड़ी चुनौतियां हैं:

  1. बड़े उद्योगों को आकर्षित करना।
  2. रोजगार के अवसर पैदा करना।
  3. शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करना।
  4. पलायन रोकना।
  5. भ्रष्टचार और अफसरशाही पर लगाम।

जब तक कोई नेता इन मुद्दों पर स्पष्ट रोडमैप नहीं देता, तब तक बिहार की स्थिति में बड़ा बदलाव मुश्किल है।

क्या बिहार नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर रहा है?

बिहार अब एक ऐसे दौर में पहुंच रहा है जहां पहली बार जातीय समीकरण से ज्यादा विकास और रोजगार की राजनीति केंद्र में आ सकती है। लेकिन इसके लिए एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत होगी जो

स्पष्ट आर्थिक विजन दे और जाति-धर्म से उपर उठ कर वास्तविक स्थिति का मुल्यांकन कर फैसला और योजना को लागू करे। निवेश और उद्योग के लिए नीति बनाए, प्रशासनिक सुधार करे अन्यथा वही होगा जो पिछले कई दशकों से होता आ रहा है। फिलहाल बिहार की राजनीति में ऐसा कोई सर्वमान्य चेहरा अभी स्पष्ट नहीं दिखता। जो है भी उसके साथ आंकड़ा नहीं है। बिहार की राजनीति एक युग समाप्ति की ओर है। लेकिन नया युग कैसा होगा और उसका नेतृत्व कौन करेगा यह अभी भी खुला सवाल है।

 

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