
News Desk | R.K. Mishra: आज की तारीख में बीजेपी का सियासी परचम लहरा रहा है। बिहार में मिली चुनावी जीत से भारतीय जनता पार्टी उत्साहित है। वर्ष 2026 की शुरूआत हो चुकी है। इस वर्ष जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं वो हैं- पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी। जहां तक पश्चिम बंगाल की बात की जाए तो यहां हाई-वोल्टेज चुनावी ड्रामा तय है क्योंकि यहां सीधे-सीधे पीएम नरेंद्र मोदी और सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आमने-सामने होंगे।

बीजेपी का शासन- टारगेट पर ब्राह्मण!
अब आते हैं असल मुद्दे पर और बात करते हैं- उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जहां दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है वहां ब्राह्मणों को टारगेट क्यों किया जा रहा है? उन्हें क्यों राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से टॉर्चर किया जा रहा है? जबकि RSS से लेकर BJP को खड़ा करने में ब्राह्मणों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है।
लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने ब्राह्मण समाज के भीतर असंतोष की चिंगारी को भड़का दिया है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के कार्यकाल में ब्राह्मण विधायकों की अलग बैठक होना यह संकेत देता है कि सब कुछ सामान्य नहीं है।
जहां तक मध्य प्रदेश का सवाल है तो यहां वरिष्ठ वकील अनिल मिश्रा की गिरफ्तारी को ब्राह्मण समाज ने अपमान और टारगेटिंग के रूप में देख रहा है। वकीलों और सामाजिक संगठनों में नाराजगी खुलकर सामने आई है। यहां तो सभी सवर्ण एक साथ खड़े नजर आ रहे हैं। जबकि यहां भी बीजेपी की सरकार है और मुख्यमंत्री मोहन यादव हैं।
ब्राह्मण समाज क्यों नाराज़ है?
ब्राह्मण संगठनों और बुद्धिजीवियों के बीच यह धारणा बन रही है कि उन्हें जानबूझकर बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व सत्ता और संगठन में उनकी भागीदारी घटा रही है, प्रशासनिक कार्रवाई में “चयनात्मक सख्ती” हो रही है, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर किया जा रहा है। यही कारण है कि बीजेपी का परंपरागत ब्राह्मण समर्थन अब पहले जैसा मजबूत नहीं दिख रहा और बगावती तेवर में दिख रहा है।

पश्चिम बंगाल में निर्णायक हैं ब्राह्मण
सूबे की आबादी 9.5-10 करोड़ है। जिसमें ब्राह्मण आबादी लगभग 45 लाख से 65 लाख के बीच मानी जाती है। कुल ब्राह्मण आबादी लगभग 5 से 7 फीसदी है। आपको बता दें कि ब्राह्मणों की आबादी पूरे राज्य में फैली हुई है, लेकिन जिन इलाकों में राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव अधिक माना जाता है वो हैं दक्षिण बंगाल में (कोलकाता, हावड़ा, हुगली, बर्दवान क्षेत्र), उत्तर बंगाल में (जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, मालदा), शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्र।
क्यों है ज्यादा राजनीतिक महत्व?
संख्या भले ही 5–7% हो, लेकिन यह वर्ग- शिक्षित और संगठित वर्ग, मीडिया, शिक्षा, वकालत, प्रशासन में मजबूत मौजूदगी, विचारधारात्मक और राजनीतिक रूप से मुखर, चुनाव में निर्णायक भूमिका (swing vote) रही है। यही वजह है कि सभी दल ब्राह्मण समाज की नाराजगी या समर्थन को हल्के में नहीं लेते। ऐसे में अब अगर 5-7% आबादी संगठित होकर वोट करे, तो 20–30% सीटों पर परिणाम बदलने की क्षमता रखते हैं। खासकर शहरी सीटों और सीमांत मुकाबलों में प्रभाव ज्यादा है। आपको बता दें कि सोशल मीडिया और सिविल सोसायटी में इनकी मजबूत मौजूदगी ने 2021 के बाद बीजेपी के लिए विचारधारात्मक आधार बनाया था।
यूपी-एमपी की नाराजगी बंगाल तक कैसे पहुंचेगी?
आज की तारीख में पूरी दुनिया एक गांव हो गई है। इंटरनेट ने सबको एक प्लेटफार्म पर ला दिया है। राजनीति में राज्य की सीमाएं भावनाओं को नहीं रोक पाती है। हाल के दिनों में यूपी-एमपी के घटनाक्रम ने सोशल मीडिया पर ब्राह्मण नेताओं की खुली नाराजगी, अखिल भारतीय ब्राह्मण संगठनों की प्रतिक्रियाएं लोगों को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जिस पार्टी और संगठन के लिए हमलोगों ने अपना सबकुछ दाव पर लगा दिया वहां आज की तारीख में बीजेपी के शासन में उन्हें टारगेट कर मारा-पीटा और जलील किया जा रहा है वो भी तब जब हम सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की बात कर रहे हैं।
ब्राह्मण को गाली दो और राजनीति चमकाओ
पिछले कई दशक से अंग्रेंजो और भारत व सनातन विरोधी तत्वों के द्वारा धर्मग्रंथों और इतिहास में छेड़छाड़ कर ब्राह्मणों को समाज में खलानायक साबित करने की साजिश चली आ रही है। और उसी आधारहीन कहानियों को पढ़कर और पढ़ाकर तथा तथ्यों को तोड़ मोड़ कर ज्यादतर राजनीतिक पार्टियां, संगठन और लोग बिना उन पर गलत आरोप-प्रत्यारोप कर अपनी राजनीतिक हित साध रहे हैं। सबसे बड़ी विडंबना ये है कि सुप्रीम कोर्ट, संसद और सभी लोग अपनी नंगी आंखों से देख रहे हैं कि बेवजह ब्राह्मणों को गाली दी जा रही है। लेकिन सब खामोश हैं। अब ऐसे में बीजेपी सत्ता में है उन्हें इनकी गोलबंदी अखर रही है। उनसे अब ये समाज सवाल कर रहा है तो वो इन्हें अपनी सत्ता की धमक से दबाना चाहते हैं। जबकि बीजेपी ही सैकड़ों बैठक और सम्मेलन जाति के नाम पर कर चुकी है। लेकिन सब करें तो जायज है और ब्राह्मण करे तो नाजायज है।

अनिल मिश्रा के उठाए सवाल गलत हैं?
जहां तक एमपी में अनिल मिश्रा के उठाए गए सवाल पर सवाल है तो क्या बीजपी सरकार बताएगी कि जब इस देश में राम-कृष्ण पर सवाल लोग कर रहे हैं तो फिर भीमराव अंबेडकर पर प्रश्न करना क्यों गलत है? लोग राम-कृष्ण को ही काल्पनिक मानकर ना जाने क्या-क्या कह रहे हैं तब तो आप मौन रहते हैं? जबकि आज आप सत्ता के शिखर जो विराजमान हैं वो राम की ही कृपा है। लेकिन बीजेपी की सरकार ने एकतरफा कार्रवाई ब्राह्मणों पर करने का फैसला कर लिया है।

बंगाल में विकल्प है!
यही कार्रवाई बंगाल के ब्राह्मणों को भी खल रही है। एक बात तय मानिए बंगाल के ब्राह्मण वोटर की मानसिकता पर इसका असर पड़ेगा। यहां उनके पास विकल्प है। ममता बनर्जी। ‘बनर्जी’ ब्राह्मण का ही टाइटल होता है। संदेश साफ है “अगर ब्राह्मण समाज की अनदेखी होगी, तो चुनाव में जवाब मिलेगा।” पश्चिम बंगाल के ब्राह्मणों ने तय कर लिया है। साथ ही देशभर के ब्राह्मण संगठनों ने ये मैसेज भी पहुंचानी शुरू कर दी है।
बीजेपी के लिए खतरे की घंटी?
अब होगा क्या- बंगाल में भाजपा पहले ही सत्ता से बाहर है, संगठनात्मक रूप से पार्टी संघर्ष करती नजर आ रही है। अगर ब्राह्मण वोट बैंक खिसका तो बीजेपी को इसका सीधे नुकसान होगा। विशेषज्ञों कि मानें तो 5-7% संगठित वोटों की नाराजगी कई सीटों का गणित बिगाड़ सकती है। क्योंकि अब उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में ब्राह्मण समाज की नाराजगी केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रही? यह असंतोष पश्चिम बंगाल के चुनावी माहौल में बीजेपी के लिए नई चुनौती बन सकता है! अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी (बाबू मोशाय) ने समय रहते संतुलन और संवाद नहीं साधा, तो बंगाल में इसका सियासी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।


