

Patna; R.K.Mishra: MLC चुनावों के नतीजे आ गए। कहीं खुशी है तो कहीं गम। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के लिए यह एक सामान्य चुनावी हार नहीं है, बल्कि उसके राजनीतिक प्रभाव, संगठनात्मक पकड़ और परंपरागत समर्थक वर्गों के बीच बदलते मन-मिजाज का बहुत ही कड़ा संदेश है। खासकर वाराणसी, नागपुर, पटना और लखनऊ के नतीजे भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय है।
अब जरा सोचिए- कहीं ऐसा तो नहीं है कि भाजपा का परंपरागत सवर्ण और शिक्षित मतदाता उससे दूर हो रहा है? और अगर ऐसा है तो क्या 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसका असर दिखाई देगा?
आइए, जरा राजनीतिक चश्मे से MLC चुनाव के नतीजों को 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हैं:-

वाराणसी: मोदी के संसदीय क्षेत्र में BJP को झटका
बात सबसे पहले करते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की। यहां पर दोनों सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में चली गई है। जनता ने मोदी-योगी की जोड़ी पर भरोसा ना करके अखिलेश यादव पर विश्वास किया है।
वाराणसी में मोदी के प्रभाव पर सवाल क्यों?
दरअसल वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है यहां दो महत्वपूर्ण सीटों पर सपा ने जीत दर्ज की। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लाल बिहारी यादव ने बीजेपी समर्थित उम्मीदवार को हराया। जबकि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में आशुतोष सिन्हा ने बीजेपी उम्मीदवार केदारनाथ सिंह को पराजित किया। स्नातक सीट पर जीत का अंतर भी काफी बड़ा रहा।
इसका राजनीतिक संदेश यह है कि प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के बावजूद भाजपा हर वर्ग के मतदाताओं को अपने पक्ष में रखने में सफल नहीं रही। आपको याद होगा संसदीय चुनाव के दौरान अयोध्या में भी बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी थी और अब काशी में भी सपा ने पटकनी दे दी। तो फिर क्यों ना माना जाए कि पीएम मोदी का मैजिक अपने ही संसदीय क्षेत्र में फीका पड़ गया है?
तो क्या प्रभु राम और भगवान शिव दोनों ने बीजेपी से अपना आशीर्वाद हटा लिया है?

नागपुर: संघ और भाजपा के गढ़ में हार
नागपुर सिर्फ महाराष्ट्र का एक जिला नहीं है बल्कि आज की तारीख में सरकार का शक्ति केंद्र है। अब ऐसे में यहां से बीजेपी का हार जाना क्या आपको नहीं लगात है कि कांग्रेस ने इस बार, वार बीजेपी के जड़ पर किया है। यहां कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने बीजेपी उम्मीदवार सुधाकर कोहले को 3,271 वोटों से हराया। ये हार और भी Important इसलिए हो जाता है क्योंकि यहीं से महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी आते हैं। गढ़करी लगातार तीन टर्म से नागपुर से जीत रहे हैं।
अब इन सबसे बढ़कर जो बात है वो है कि RSS, जो बीजेपी की मातृ संस्था का मुख्यालय भी यहीं है। अब ऐसे में यहां से बीजेपी सीट गंवा देती है तो फिर कैसे ना विपक्षियों को बोलने का और राजनीतिक विश्लेषकों को विश्लेषण करने का मौका मिले।
लखनऊ: राजधानी में BJP की पकड़ पर सवाल
लखनऊ यूपी की राजधानी है जहां से सूबे की सियासत तय होती है। यह वही जगह है जहां पर सीएम योगी आदित्यनाथ बैठकर पूरे प्रदेश को राजनीतिक और शासकीय संदेश देते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि स्नातक सीट पर जेन जी ने उनकी एक ना सुनी और सीट सपा की झोली में डाल दी।
दूसरी ओर ये वही संसदीय क्षेत्र है जहां से बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और वर्तमान में केंद्र में मंत्री राजनाथ सिंह तीन बार से लगातार जीत रहे हैं। आपको याद होगा की कैसे 5 नवंबर 2024 को झारखंड के लोहरदगा में एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने कहा था “किसी माई के लाल ने दूध नहीं पिया है कि आरक्षण को समाप्त कर दे।” उसके बाद आज की तारीख में बीजेपी का यूजीसी जैसा काला कानून लाना ,एससी/एसटी एक्ट और आरक्षण को लेकर सवर्ण मतदाता बीजेपी से नाराज हैं। कहीं सपा की जीत इसका टेलर तो नहीं है। पिक्चर तो कुछ ही दिनों में यूपी के विधासभा चुनाव में रिलिज होने वाली है।
पटना: नितिन नबीन को दोहरा झटका!
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन को अभी बांकीपुर विधानसभा सीट पर पार्टी को मिली करारी हार से राहत भी नहीं मिली थी कि पटना शिक्षक सीट पर आरजेडी ने बीजेपी के दिग्गज नेता नवल किशोर यादव को शिक्षकों ने हरा कर नाराजगी का स्पष्ट संकेत दे दिया है, कि अब और नहीं। इस जीत से ये भी बात साफ होती है कि कब तक बीजेपी लालू के जंगलराज का भय दिखाकर मतदाताओं का इस्तेमाल करती रहेगी।
यहां एक बात और भी है इस सीट पर सवर्ण मतदाताओं ने इस बार जमकर राजद के पक्ष में वोट किया नतीजा सबके सामने है कि डॉक्टर संजीव कुमार चुनाव जीत गए। हां एक बात जरूर रही कि पटना स्नातक सीट पर जेडीयू ने अपनी पकड़ बरकरार रखी। नीरज कुमार चुनाव जीत गए। एनडीए के लिए थोड़ी राहत की खबर है लेकिन बीजेपी के लिए आफत की।
इन सबके बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यूपी की 11 MLC सीटों में बीजेपी ने 6 और सपा ने 5 सीटें जीतीं। यानी बीजेपी चुनाव हारी नहीं, लेकिन विपक्ष ने उसे कड़ी चुनौती दी। आप इस संकेत को हल्के में नहीं ले सकते। वो भी तब जब कुछ ही दिनों में विधानसभा चुनाव हो। यह बीजेपी के लिए चेतावनी है।
हार के कुछ महत्वपूर्ण कारण
बीजेपी के भीतर उम्मीदवार चयन को लेकर असंतोष।
स्थानीय नेताओं के बीच आपसी खींचतान।
शिक्षित मतदाताओं के बीच पार्टी की स्वीकार्यता का सवाल।
संगठनात्मक कमजोरी और स्थानीय मुद्दे।
सवर्ण समाज का BJP से मोहभंग ?
अब यह जान लीजिए कि हाल के दिनों में बीजेपी के द्वारा सवर्ण लोगों के खिलाफ लिए गए फैसले ने पूरी तरह से बीजेपी से उनका मोहभंग करा दिया है। आज की तारीख में बीजेपी का एक भी नेता नहीं है जो यूजीसी एक्ट,एससी/एसटी एक्ट और आरक्षण जैसे मुद्दों पर किसी सवर्ण के सवालों का जवाब दे सके। ऐसे में बीजेपी के सामने सवर्ण मतदाताओं के बीच भरोसा बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती है।
महंगाई और आर्थिक दबाव
मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार बड़ी समस्याएं हैं। इन मुद्दों पर सरकार के प्रति असंतोष चुनाव में दिखाई दे रहा है औऱ आने वाले दिनों में अगर सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाये तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
मोदी जी का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और चुनावी नतीजे अलग क्यों?
आपको बता दें कि यही बीजेपी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अंतरराष्ट्रीय छवि, विदेश नीति और वैश्विक मंचों पर भारत की उपस्थिति अपनी जगह है। लेकिन मतदाता के लिए कुछ दूसरे सवाल भी हैं जैसे-
मेरे बेटे को नौकरी कब मिलेगी?
महंगाई कब कम होगी?
प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता कब आएगी?
छोटे कारोबारियों की आर्थिक स्थिति कब सुधरेगी?
शिक्षकों और कर्मचारियों की समस्याएं कब हल होंगी?
स्थानीय जनप्रतिनिधि जनता के बीच कितने सक्रिय हैं?
यहां पर बीजेपी को ये समझनी होगी कि अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता और स्थानीय चुनावी लोकप्रियता हमेशा एक जैसी नहीं होती।
मतदाता पीएम नरेंद्र मोदी की विदेश नीति से प्रभावित हो सकता है, लेकिन स्थानीय उम्मीदवार को उसकी कार्यशैली, उपलब्धता और व्यक्तिगत छवि के आधार पर वोट दे सकता है। इसलिए मोदी की लोकप्रियता को हर चुनाव में जीत की गारंटी मानना राजनीतिक भूल होगी।
UP विधानसभा चुनाव में इसका असर पड़ेगा?
मेरे विचार से इसका असर पड़ सकता है, लेकिन तीन परिस्थितियों में।
1 : सवर्ण मतदाताओं में नाराजगी बढ़ती है तो!
अगर ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ, भूमिहार और वैश्य जैसे परंपरागत बीजेपी वोटर वर्गों में असंतोष बढ़ता है और वह वोट में बदलता है, तो भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। विशेषकर उन सीटों पर जहां जीत का अंतर कम रहता है।
2 : सपा इस नाराजगी को राजनीतिक समर्थन में बदलती है?
अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे केवल PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति तक सीमित न रहें। अगर समाजवादी पार्टी शिक्षित मध्यमवर्ग, बेरोजगार युवाओं, शिक्षकों और बीजेपी से नाराज सवर्ण मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाती है, तो उसका चुनावी आधार विस्तृत हो सकता है।

3 : बीजेपी अपनी गलतियां सुधारती है या नहीं!
बीजेपी के पास अभी भी मजबूत संगठन, बूथ प्रबंधन और व्यापक चुनावी नेटवर्क है। अगर पार्टी उम्मीदवार चयन, स्थानीय नेतृत्व, रोजगार, शिक्षा और महंगाई जैसे मुद्दों पर काम करती है तो वह इस नुकसान की भरपाई कर सकती है।
भाजपा- सबसे बड़ा खतरा क्या है?
भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष की ताकत से ज्यादा अपने समर्थक वर्गों में पैदा होने वाली चुप्पी और नाराजगी है। किसी पार्टी का पारंपरिक मतदाता जब विपक्ष को वोट देने लगता है, उससे भी ज्यादा खतरनाक स्थिति तब होती है जब वह मतदान के दिन घर से ही नहीं निकले। नागपुर, वाराणसी, पटना और लखनऊ के परिणामों में बीजेपी को इस पहलू पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
हां एक बात औऱ 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव केवल मोदी- अखिलेश या योगी बनाम अखिलेश नहीं होगा। यह चुनाव रोजगार, सामाजिक समीकरण, जातीय प्रतिनिधित्व, महंगाई, कानून-व्यवस्था, यूजीसी जैसे काला कानून,एससी/एसटी एक्ट, आरक्षण और स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता पर भी लड़ा जाएगा।


