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Bank Merger in India: 12 से 6 बैंक का प्लान- अर्थव्यवस्था मजबूत होगी या खतरा बढ़ेगा?-Bank Merger in India: 12 से 6 बैंक का प्लान- अर्थव्यवस्था मजबूत होगी या खतरा बढ़ेगा?-Bank Merger in India: 12 से 6 बैंक का प्लान- अर्थव्यवस्था मजबूत होगी या खतरा बढ़ेगा?-Bank Merger in India: 12 से 6 बैंक का प्लान- अर्थव्यवस्था मजबूत होगी या खतरा बढ़ेगा?-Bank Merger in India: 12 से 6 बैंक का प्लान- अर्थव्यवस्था मजबूत होगी या खतरा बढ़ेगा?-Bank Merger in India: 12 से 6 बैंक का प्लान- अर्थव्यवस्था मजबूत होगी या खतरा बढ़ेगा?-‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ में बड़ी उपलब्धि: 1 करोड़ 56 लाख महिलाओं के खाते में पहुंचे 15,600 करोड़ रुपये, 10 लाख लाभुकों को मिली 1000 करोड़ की राशि।-‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ में बड़ी उपलब्धि: 1 करोड़ 56 लाख महिलाओं के खाते में पहुंचे 15,600 करोड़ रुपये, 10 लाख लाभुकों को मिली 1000 करोड़ की राशि।-‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ में बड़ी उपलब्धि: 1 करोड़ 56 लाख महिलाओं के खाते में पहुंचे 15,600 करोड़ रुपये, 10 लाख लाभुकों को मिली 1000 करोड़ की राशि।-‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ में बड़ी उपलब्धि: 1 करोड़ 56 लाख महिलाओं के खाते में पहुंचे 15,600 करोड़ रुपये, 10 लाख लाभुकों को मिली 1000 करोड़ की राशि।

Bank Merger in India: 12 से 6 बैंक का प्लान- अर्थव्यवस्था मजबूत होगी या खतरा बढ़ेगा?

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Patna,R.K.Mishra,(Bank Merger in India): सरकारी बैंकों के विलय को लेकर एक बार फिर देश में चर्चा का बाजार गर्म हो गया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का उद्देश्य देश में मौजूद 12 सरकारी बैंकों की संख्या कम करके उन्हें 6–7 बड़े और “वैश्विक स्तर के बैंकों” के रूप में खड़ा करना है। सरकार का दावा है कि बड़े बैंकों की बैलेंस शीट मजबूत होगीऋण देने की क्षमता बढ़ेगीडिजिटल बैंकिंग तेज होगी और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए पूंजी जुटाने में आसानी होगी।  

लेकिन सवाल अब भी वही है-

क्या पिछले मर्जर से ग्राहकों को फायदा मिला?

और क्या केवल “संख्या घटाने” से बैंकिंग सिस्टम वाकई मजबूत हो सकता है?

पहले हुए मर्जर: क्या ग्राहकों का अनुभव बेहतर हुआ?

पिछले वर्षों में कई बड़े सरकारी बैंकों का मर्जर किया गया – जैसे

  • SBI में उसके सहयोगी बैंक।
  • BOB–Vijaya–Dena बैंक।
  • Punjab National Bank में Oriental Bank और United Bank, आदि।

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सरकार का दावा था कि इससे:

  • सेवाएं बेहतर होंगी।
  • तेज ऋण वितरण होगा।
  • लागत घटेगी।
  • टेक्नोलॉजी एकीकृत होगी।

लेकिन हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में ग्राहकों ने इन मर्जर के बाद शिकायतें दर्ज कराईं:

  • शाखाओं में स्टाफ की कमी।
  • पुराने खाते व नई प्रणाली में तालमेल की दिक्कत।
  • सेवा में देरी।
  • पासबुक–IFSC- खाता माइग्रेशन की परेशानी।
  • शिकायत निवारण प्रणाली धीमी।

सरकार का दावा है कि बैंक के मर्जर से ग्राहको को लाभ मिला है। मेरा मानना है कि हम सब कभी ना कभी बैंक जाते होंगे।  अब एक बार फिर आप खुद बैंक में जाएं और महसूस कीजिए कि जब सरकार ने बैंक मर्जर नहीं किये थे तो कैसे कार्य होते थे और जब बैंंक मर्जर हुआ तो कितनी बैंक और उसके कर्मचारियों के कार्यशैली में बदलाव आया। आप पाएंगे कि ग्राहक के तौर पर कई क्षेत्रों में कोई बड़ा सुधार नहीं दिखा। SBI जैसे बड़े बैंकों की शिकायतें तो लगातार बढ़ती ही जा रही हैं- कई लोग कहते हैं कि कर्मचारियों का रवैया ऐसा रहता है जैसे वे “ग्राहक के नहीं, संस्था के मालिक” हों

क्या सरकार छोटे बैंकों को प्रभावी ढंग से चला पाने में विफल रही?

  • सरकार छोटे बैंकों को मैनेज करने में सक्षम नहीं दिखी।
  • NPA बढ़ते गए।
  • प्रबंधन में स्थिरता की कमी रही।
  • समय पर निगरानी नहीं हुई।

क्या इसे ऐसे नहीं देखा जा सकता है? जब सरकार,आरबीआई और सिस्टम छोटे बैंकों को सक्षम नहीं कर पाया, तो सरकार ने इसका समाधान मर्जर मान लिया। इससे ऐसा लगता है कि विफल प्रबंधन को जोड़कर एक बड़ा ढांचा बनाकर सरकार आंकड़ों में मजबूती दिखाना चाहती है।

क्या दुनिया के अन्य देश भी ऐसा करते हैं?

हां, दुनिया में कई देशों में बैंक मर्जर होते हैं-

  • अमेरिका में 2008 संकट के बाद।
  • यूरोप में कई बैंकों के विलय हुए।
  • जापान में भी बड़े बैंक गठित किए गए।

लेकिन फर्क यह है:

  • इन देशों में बैंकिंग कानून बेहद सख्त हैं।
  • ग्राहक सेवाओं पर कड़ी निगरानी होती है।
  • बैंकिंग स्टाफ का व्यवहार व सेवा-मानक उच्च स्तर पर होते हैं।
  • भ्रष्टाचार, ढिलाई और राजनीतिक हस्तक्षेप कम होता है।

ये सच्चाई है कि भारत में यह ढांचा उतना मजबूत नहीं है जितना विदेशों में। इसलिए केवल “संख्या घटाने” से भारत अभी दुनिया के शीर्ष बैंकिंग ढांचे में शामिल नहीं हो सकता।

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क्या बड़े बैंक मतलब सुरक्षित बैंक?

बड़े बैंक बनाना मतलब मजबूत बैंक। यह जरूरी नहीं।

सवाल यह भी है कि लुंज पुंज और भ्रष्ट बैंकिंग सिस्टम में-

अगर कल की तारीख में इतना बड़ा बैंक ही किसी संकट में फंस गया तो?

  • क्या यह “Too Big To Fail” का खतरा पैदा नहीं करेगा? उदाहरण: अमेरिका में 2008 के वित्तीय संकट के दौरान, कई बड़े बैंकों और वित्तीय संस्थानों को “टू बिग टू फेल” माना गया था, और उन्हें दिवालिया होने से बचाने के लिए सरकारी सहायता दी गई थी। एक बड़े निवेश बैंक के दिवालिया होने से दूसरे बैंकों पर दबाव बढ़ेगा और लोगों के पैसे की सुरक्षा पर सवाल उठेगा। 
  • क्या इससे पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था डगमगा सकती है?
  • क्या हम एक वित्तीय गलती का भार पूरे राष्ट्र पर डालने का जोखिम ले रहे हैं?

ऐसे में जब बैंक कम होंगे और आकार बड़े होंगे, तो विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का असर भारत की बैंकिंग पर कहीं ज्यादा गहरा नहीं होगा!

क्या छोटे बैंक सुदृढ़ बनाकर भी मजबूत अर्थव्यवस्था बनाई जा सकती है?

जी हां ऐसा किया जा सकता है।

  • छोटे बैंकों को आधुनिक तकनीक से लैस कर।
  • उन्हें स्थानीय वित्तीय जरूरतों के अनुसार चलाकर।
  • उन्हें स्वायत्तता देकर।
  • छोटे बैंकों का एक बड़ा नेटवर्क बनाकर।

बेहद मजबूत और स्थिर वित्तीय ढांचा खड़ा किया जा सकता है। ये बैंक स्थानीय व्यवसायों का समर्थन करते हैं, रोजगार सृजित करते हैं और स्थानीय समुदाय में आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा देते हैं। भारत भी चाहे तो यही मॉडल अपना सकता है लेकिन इसके लिए राजनीतिक हस्तक्षेप रोकना, प्रबंधन सुधारना, स्टाफ प्रशिक्षण और जवाबदेही सबसे पहले जरूरी है।

निष्कर्ष

मेरा मानना है कि बैंकों का मर्जर एक आर्थिक रणनीति जरूर हो सकती है, लेकिन यह हर समस्या का समाधान नहीं। जब तक भारत बैंकिंग सेवाओं की गुणवत्ता, स्टाफ की जवाबदेही, ग्राहक-प्राथमिकता और निगरानी तंत्र को बेहतर नहीं करेगा –
तब तक केवल “संख्या घटाने” से न भारतीय बैंक वैश्विक स्तर पर पहुंचेंगे, और न ग्राहक अनुभव सुधरेगा।

सवाल है देश के आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से, सवाल है भारत के माननीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जी से और सवाल आप से भी है आरबीआई के सम्माननीय गवर्नर संजय मल्होत्रा साहब ? – बैंक का आकार बढ़ता है – पर बैंक की विश्वसनीयता, सेवा, ग्राहक सम्मान, और जवाबदेही नहीं बढ़ती? जिम्मेवार कौन है? 

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