लखनऊ/ उमाशंकर उपाध्याय। आज के दौर में भोजपुरी गीतकारों और गायकों ने अपनी विधा के जरिए समाज में गन्दगी का ऐसा माहौल बना दिया है कि अब लोग भोजपुरी से दूरी बना रहे हैं। आलम ये है की पारंपरिक गीत भी लोगों से परे होता जा रहा है। इस बीच एक निजी चैनल ने भोजपुरी की अस्मिता बचाने, गन्दगी को दूर करने के लिए मुहिम चलाई। इस मुहिम के तहत उन तमाम गायकों को टारगेट किया जो भोजपुरी में अश्लीलता फैला रहे हैं।

भोजपुरी इंडस्ट्री में अश्लीलता से आहत गीतकार नेहा राठौर लिखती हैं कि, “कितनी अजीब बात है कि जिन गायकों को भोजपुरी समाज के लोगों ने असीम प्रेम और सम्मान दिया, उन्हीं गायकों ने भोजपुरी समाज के लोगों की बहू-बेटियों की इज्जत का मजाक बनाकर रख दिया है. उससे बड़ा आश्चर्य तो ये है कि लोग अपने आत्मसम्मान को भूलकर इन सड़कछाप गवैयों के पक्ष में अपनी भाषा और लोक-संस्कृति से बेईमानी कर रहे हैं.” नेहा ने उन तमाम गायकों और भोजपुरी समाज के ठेकेदारों से सवाल किया कि “क्या भोजपुरी समाज की औरतें सिर्फ देह बनकर रह गयी हैं? क्या उनकी अपनी कोई चेतना, कोई सम्मान नहीं है? क्या भोजपुरी समाज में देवर-भाभी का संबंध सच में वैसा है जैसा ये लीचड़ बताते हैं? ये सड़कछाप गवैये होते कौन हैं पूरे महिला समाज को बेइज्जत करने वाले?आप लोगों का खून नहीं खौलता? आपको क्या लगता है कि आपकी अपनी बहनें इनके गाये अश्लील गीतों के दायरों से बाहर हैं? उन्हें इनका दंश नहीं भुगतना पड़ता?

नेहा की श्रोताओं से अपील, “अश्लीलता फैलने वालों को रोकने में मदद करें”
नेहा ने अपील किया कि “इससे पहले कि आपकी आंख का पानी मर जाये, विरोध कीजिये इन गंदे लोगों का. और कोई रास्ता नहीं है अब.” साथ ही उन्होंने कहा कि भोजपुरी को अश्लीलता से मुक्त कराने में मुझे आपका सहयोग चाहिये. मुझसे नाराज होने के लिए, मेरी आलोचना करने के लिए आपका पूरा जीवन पड़ा है.. पर मेरी इस मुहिम में मेरा साथ दीजिये. ये हमारे साझा हितों की लड़ाई है, हमारी भाषा-संस्कृति की लड़ाई है. कुछ धूर्त लोगों ने इसे हाईजैक कर रखा है, हमें उनसे अपनी भाषा को मुक्त करवाना है. मेरा साथ दीजिये.

शहरों की मैरिज लान की बजाय कभी गुजारिए गांव की शादियों में

कुछ विद्वान लोग कह रहे हैं कि मैंने जो पारंपरिक गाली गायन किया है, वो भी तो अश्लील ही है न! इन विद्वानों से मैं बस यही कहूंगी कि कुछ दिन गाँव-देहात में गुजारिये और मौका लगे तो मैरिज लॉन वाली शादियाँ छोड़कर गाँव-देहात की एकाध शादी अटेंड कर लीजिये.

मेरा भरोसा कीजिये, वहाँ चाची-दादी की उम्र की सम्भ्रान्त औरतों के मुँह से ऐसी गालियाँ सुनने को मिलेंगी कि कान के कीड़े गिर जाएंगे. गाली-गायन हमारी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें शादी-ब्याह में लड़की के पक्ष की औरतों की तरफ से बारातियों के लिए गालियाँ गायी जाती हैं.

अब मेरी बात ध्यान से सुनिये. आपको मेरी बातों का विरोध करना है तो शौक से कीजिये, पर तर्क थोड़ा मजबूत लेकर आइये. सिर्फ विरोध करने के लिए विरोध मत कीजिये. आलोचना बेहद शानदार चीज है, पर ये तार्किक होनी ही चाहिये.