हरिद्वार। पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “मनुष्यत्व से दैवत्व की यात्रा सिद्धि एवं भौतिक-आध्यात्मिक उन्नति के मूल में मानवी पुरुषार्थ ही मूल है। प्रारब्ध-भोग भाग्य की अपनी महत्ता है, किन्तु देवता भी पुरुषार्थ के ही सहायक और प्रशंसक हैं ! अतः पुरूषार्थी बनें व आत्म जागरण के लिए तत्पर रहें …”। ज्ञान की प्राप्ति और अज्ञान-जनित आग्रहों से मुक्ति जीवन का श्रेष्ठतम पुरुषार्थ है, इसलिय सत्संग-स्वाध्याय का आश्रय लेकर आत्म-जागरण के लिए सतत् प्रयत्नशील रहें ! “मनएव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् …”।। मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है, जो मन विषयों में आसक्त हो तो बंधन का कारण बनता है और निर्विषय अर्थात् वीतराग हो जाता है तो मुक्ति अर्थात् मोक्ष का कारण बनता है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि स्वाध्याय में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए। स्वाध्याय मन की मलिनता को साफ करके आत्मा को परमात्मा के निकट बिठाने का सर्वोत्तम मार्ग है। अतः प्रत्येक विचारवान व्यक्ति को प्रतिदिन संकल्पपूर्वक सद्ग्रंथों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। जो हमेशा स्वाध्याय करता है, उसका मन हमेशा प्रसन्नचित और शांत रहता है। स्वाध्याय से ज्ञानवर्धन होता है, जिससे धर्मं और संस्कृति की सेवा होती है।स्वाध्याय से अज्ञान और अविद्या का आवरण हटने लगता है और वेदादि शास्त्रों के दिव्य ज्ञान का प्राकट्य होता है। प्रतिदिन स्वाध्याय करने से बुद्धि अत्यंत तीव्र हो जाती है। कठिन से कठिन विषय को तुरंत समझ लेती है। जो साधक प्रतिदिन स्वाध्याय करते हैं, वे कभी भी साधना से भटकते नहीं तथा जो बिना स्वाध्याय के साधना करेगा उसकी साधना कभी सफल नहीं हो सकती। जो प्रतिदिन स्वाध्याय करता है, उसकी बुद्धि इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि वह प्रकृति के रहस्यों को भी स्वतः जानने लगता है। जो प्रतिदिन साधना करता है, वही उच्चस्तरीय साधनाओं का अधिकारी हो सकता है। जिन्हें ईश्वर में श्रृद्धा और विश्वास नहीं होता, उन्हें चाहिए कि प्रतिदिन स्वाध्याय करें तथा प्रतिदिन ईश्वर के दिए हर उपहार के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें …।

पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – योग दर्शन में पांच नियम आते हैं – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान। ये पांच नियम जीवन को व्यवस्थित और अनुशासित करने के लिए हैं। इन पांच नियमों में एक है – स्वाध्याय। अर्थात्, स्वयं का अध्ययन। स्वयं को जानना स्वाध्याय कहलाता है। स्वाध्याय के नाम पर बहुत से लोग कह देते हैं कि आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ने चाहिए, धर्म-शास्त्र पढ़ने चाहिए, उपनिषद् पढ़ने चाहिए और इस तरह स्वाध्याय का मतलब बाह्य अध्ययन से लगाया जाता है। शास्त्र-अध्ययन को ही स्वाध्याय कहा जाये, यह इसका केवल एक पक्ष हुआ। लेकिन अगर शब्दों को ठीक से समझा जाये तो स्वयम् का अध्ययन स्वाध्याय कहलाता है। तब आत्म-परीक्षण, आत्म-निरीक्षण, आत्म-चिंतन और आत्म-शोधन स्वाध्याय के अंग बनते हैं। सामान्य रूप से लोग स्वाध्याय को ज्ञान अर्जित करने का साधन मानते हैं। शास्त्रीय ज्ञान को तो लोग अर्जित कर लेते हैं, लेकिन अपने बारे में, अपने व्यवहार को, अपने मन को, अपनी इच्छाओं को, अपनी महत्वाकांक्षाओं को नहीं जान पाते हैं। अपनी इच्छाओं, कमजोरियों, सामर्थ्यों, प्रतिभाओं और महत्वाकांक्षाओं को जानना, समझना और उन्हें व्यवस्थित करना, यह असली स्वाध्याय है। इस प्रकार स्वयं का अध्ययन करके स्वयं को व्यवस्थित करना ही स्वाध्याय का वास्तविक अर्थ है …।

पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – शिक्षा की पूर्णता स्वाध्याय द्वारा होती है। स्वाध्याय का अर्थ है – आत्म-शिक्षण; जिसमें हम आत्म चिन्तन, मनन और अध्ययन का भी समावेश पाते हैं। स्वयं जब हम परिश्रम के द्वारा किसी वस्तु विशेष का समाधान करते हुए उत्तरोत्तर उन्नतोन्मुख होकर किसी नवीन वस्तु की खोज के निष्कर्ष पर पहुँचते हैं तब उसको हम स्वाध्याय द्वारा उपार्जित वस्तु कहते हैं। नवीनता का समारम्भ किसी स्वाध्यायी व्यक्ति द्वारा हुआ और उसकी अविरल तारतम्यता उन्हीं के द्वारा चल रही है। उत्तरोत्तर नवीनता का आविष्कार होने का अर्थ है – उन्नति के सोपान पर आरोहण। स्वाध्याय द्वारा प्राप्त ज्ञान वास्तव में ज्ञान होता है। जो ज्ञान हम बलपूर्वक किसी-दूसरे से प्राप्त करते हैं वह टिकाऊ कदापि नहीं होता। संसार में जितने महापुरुष हुए हैं उनके जीवन में केवल यही विशेषता रही है कि वे जीवन भर स्वाध्यायी रहे हैं। स्वाध्यायी व्यक्तियों में एकाकीपन और लोक-कल्याण की भावना अधिक रहती है। यह बात स्वाभाविक ही है कि एकाकीपन में हम अपने मस्तिष्क का सन्तुलन अधिकाधिक कर पाते हैं। कवियों और कलाकारों के जीवन चरित्र को पढ़ते समय हम उनके आरम्भिक जीवन के पन्ने को जब पलटते हैं तो पता चलता है कि एकाकी अवस्था में रहकर घंटों पहले गुनगुनाया करते थे। हाँ, एकाकीपन और प्रकृति का घनिष्ठ सम्बन्ध है। एकाकीपन को पसन्द करने वाला व्यक्ति प्रकृति प्रेमी होता है। प्रकृति का अध्ययन कितना मनोरंजक और ज्ञानवर्धक होता है। ज्ञान का अगाध समुद्र प्रकृति में वर्तमान है। स्वाध्यायी उसमें डुबकियाँ लगाते हैं और मोतियों की लड़ियाँ निकालते चले जाते हैं। स्वाध्यायी पुरुषों से युक्त देश का ही भविष्य उज्ज्वल है और वही उन्नतिशील राष्ट्रों के समकक्ष में बैठने का भी अधिकारी है। हमें स्वाध्यायी बनाने के लिए हमारी शिक्षापद्धति विशेष रूप से सहयोग प्रदान करती है। अतः शिक्षा की पद्धति ऐसी होनी चाहिए कि हमारी ईश्वर प्रदत्त शक्तियों का विकास हो सके, क्योंकि उन शक्तियों के विकास होने पर हममें उपर्युक्त गुण स्वभावतः आ जायेंगे …।