Patna:बिहार प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी ने सरकार पर बड़ा आरोप लगा हमलावर होते हुए कहा कि “बिहार बेरोजगार है, नीतीशे कुमार है” सरकार अपनी 15 वर्षों की विफलताओं को ढंकने की कोशिश कर रही है। बिहार में सर्वाधिक 59% नौजवानों की आबादी है। जबकि लाखों युवा मजदूर के रूप में बिहार के बाहर मजदूरी करने को विवश हैं। केंद्र व सूबे बिहार में कांग्रेस व कांग्रेस की नितियां ही विकल्प के रूप में दिखती हैं, जिसे धीरे धीरे आमजन मानने भी लगे हैं।

एक तरफ कांग्रेस अपने पूर्व राष्ट्रिय अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी जी के माध्यम से लगातार दुनिया के विख्यात, शीर्षस्थ अर्थशास्त्रियों के साथ बातचीत कर केंद्र व राज्यों की सरकारों को चरमराई अर्थव्यवस्था सुधारने के उपाय व अवसर देती है। कांग्रेस अपने अनुभवों व विशेषज्ञों के समूहों के माध्यम से बताती है कि वित्तीय आपात काल में गवर्नेंस कैसे होती है।सोशल वेलफेयर पर सरकारी खर्च बढ़ा माँग जेनेरेट करने के उपाय सुझाये जाते हैं, MSME सूक्ष्म, कुटीर, लघु व मध्यम उद्योगों को सरकार द्वारा संरक्षण प्रदान करने की बात कहते हैं, ताकि रोजगार जाये नही और अलग से रोजगार का तेज सृजन हो, गरीबी से सिकुड़ी अर्थव्यवस्था में तेज सुधार हो।

वहीं, बीजेपी व उनके सहयोगी दलों की सरकारें लगातार टैक्सों में वृद्धि कर लूटी पिटी अर्थव्यवस्था में आम जनों, दिहाड़ी, मजदूरी करने वाले, किसानों, छोटे व्यापारियों व उद्योगपतियों को चूसने के साथ उन्हें मरने को विवश कर रहे हैं। चुनींदा बड़े औद्योगिक घरानों की सेवा करते, मेवा पाते देश का बेड़ागर्क करते इन्हें लज्जा का एहसास तक नहीं है। विश्व के जाने माने अर्थशास्त्रियों से अलग इनके पोंगापंथी नीतियों पर सरकार चल रही है।पुरे देश को ज्ञान विज्ञान स्वास्थ्य सेवाओं से अलग थाली और दिया जलवा कबीलाई संस्कृति में वापस धकेलने की अंधाधुंध कोशिश में लगे हैं। एक तरफ Covid19 Pandemic के दौर में वो लाखों लाख बिहारी मजदूर भाई अपनों के पास आना चाहते हैं, साथ ही डूबती, तबाह अर्थव्यवस्था में उनके वापस जाने की गुंजाइश भी नहीं है एवं उनमें घबराहट इतनी है कि वो पुनः वापस जाने को भी तैयार नहीं हैं। इनके पुनर्वास, रोजगार व जीने योग्य बाजार तक, ना तो राज्य सरकार ने विकसित किया है, ना ही सरकार के पास इतना संसाधन है कि उनकी मदद कर पाएं और ना ही सरकार के मंत्रिमंडल के लोगों का ही आपस में समन्वय है।

मुख्यमंत्री कुछ कहते हैं स्वास्थ्य मंत्री केंद्रीय मंत्री के दबाव में कुछ और ही जपते हैं। सरकार है कहाँ ये कह पाना मुश्किल है। मुख्यमंत्री की डोर किसके हाथ है ये समझना भी मुश्किल है।कई मंत्रियों में अनर्गल बोलने और अखबारों में छपने की हड़बड़ी व बीमारी अलग है।कोई उद्योग धंधा ना तो इस 15 वर्षीय सरकार में विकसित किया गया, जिससे रोजगार के साधन बनें। और ना ही कृषि के लिए किसानों को सहायता दे प्रोत्साहित किया गया।गौरतलब बात ये है कि इससे पूर्व की लालू राबड़ी सरकार को ये 15 वर्षों तक इसी नाम पर कोसते भी रहे कि सूबे में रोजगार नहीं है, रोजगार सृजन पर सरकार का ध्यान नहीं है। तब युवा पलायन कर रहे थे। तो अब क्या दिख रहा है? लाखों लाख की संख्या में बेरोजगार, मजदूर छात्र लौटने को तड़प रहे हैं।

यदि बिहार में पिछले 15 वर्षों में रोजगार सृजन के काम होते तो ऐसे दिन नहीं देखने पड़ते। आज 15 वर्षों के नीतीश जी के शासन में, बेरोजगारी की समस्या पूर्व की तुलना में और भयावह हो गयी।क्या कोई बहाना बचता है कि 15 वर्षों में एक भी उद्योग नहीं लगाए, ना ला पाये और ना ही लाने का प्रयास किया।बल्कि जो चीनी मील और कुछ उद्योग चल भी रहे थे उन्हें भी बन्द करने पर मजबूर कर दिया।कृषि को चौपट किया।विश्वविद्यालयों सहित सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था व स्वास्थ्य सेवाओं तक को तार तार कर रख छोड़ा है।शायद इसलिए भी बिहार की सरकार मेहनतकश मजदूरों को वापस बिहार आने नहीं देना चाहती।बड़े शहरों से लौटे मजदूर, बिहार की कुव्यवस्था झट समझ जाएंगे और साथ ही चुनाव में वोट भी करेंगे तो नितीश सरकार की रुखसती तय है।माननीय मुख्यमंत्री व इनके उपमुखिया साथी कभी नहीं चाहते की प्रवासी बिहारी मजदूर भाई कभी वापस आएं बीजेपी तो पूरी पार्टी ही गरीब, मजदूर, किसान विरोधी रवैये के लिए कुख्यात है और बिहार के हुक्मरानों की भी कोई इच्छा नहीं है कि किसी भी तरीके से ये गरीब मजदूर किसान भाई वापस आ सकें।शायद आगामी चुनावों में बिहार समेत सभी प्रदेशों में बदलते चुनावी सामाजिक डेमोग्राफी का खामियाजा भुगतने का भी डर है सत्ताधीशों को।