नई दिल्ली,राम महेश मिश्र: भारतीय संस्कृति ने वैज्ञानिकों को *ऋषि* की संज्ञा दी है। गहन शोध करके मानव मात्र-प्राणिमात्र को अभिनव चीजें देने वाले वैज्ञानिकों की राय की अनदेखी भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में अक्सर कर दी जाती है। आल इण्डिया जर्नलिस्टस यूनियन के संरक्षक श्री राम महेश मिश्र अपनी शासकीय सेवा के अन्तिम दौर में १७ वर्षों तक उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान में सेवारत रहे थे। वह बताते हैं कि उसके पूर्व हमने छह साल तक राज्य सचिवालय में वरिष्ठ शासन सदस्यों के सन्निकट रहकर भी कार्य किया था। उन्होंने बताया कि दोनों स्थानों की सेवा के अनुभवों के आधार पर कहता हूं कि ऋषितुल्य वैज्ञानिकों के सुझावों को अनेक बार गम्भीरता से नहीं लिया जाता है, जिसके दूरगामी दुष्परिणाम बड़े भयंकर होते हैं।

एआईजेयू संरक्षक मिश्र जी कहते हैं कि कोरोना समस्या के सन्दर्भ में भी चीन के बुहान से ऐसी ही शिकायतें प्रकाश में आती रही हैं। उन्होंने कहा कि हमारे भ्रातृवत मित्र एवं वरिष्ठ चिंतक व लेखक श्री राकेश दुबे ने अपने दैनिक लेखन *प्रतिदिन” की श्रृंखला में आज जो लेख लिखा है, वह श्रेष्ठ विचार प्रवाह से परिपूर्ण एक गंभीर विचारक व्यक्तित्व की अंतर्मन की पीड़ा है। इसे हर किसी को अवश्य पढ़ना चाहिए…:-

*दुष्काल : वैज्ञानिक चेतावनियों की अनदेखी का नतीजा ?*

अब यह तथ्य स्थापित होने लगा है कि वैश्विक रूप से महामारी फैलने के जानकारी भारत समेत सभी देशों को थी। साथ ही यह स्पष्ट होने लगा है कि वैज्ञानिक चेतावनियों को अनदेखा भी सबने किया है | इन सारे संदेहों की परिधि से निकलते संकेत इस बात का प्रमाण हो सकते हैं कि यह आपदा मानव निर्मित है और यह इससे पहले महामारियों के रूप में आई आपदा की एक कड़ी है|

याद कीजिये, नवंबर, २००२ और जुलाई, २००३ के आठ महीनों के बीच दक्षिणी चीन में जिस सार्स रोग का आरंभ हुआ था, वह कुछ समय बाद ही ३७ देशों में फैल गया था | जुलाई, २००३ में यह महामारी लगभग समाप्त हो रही थी और उस समय तक वैक्सीन (टीका) तैयार होक्र बाज़ार में आ गया था| इबोला वायरस अफ्रीका में दिसंबर, २०१३ में आरंभ हुआ और दो वर्ष बाद जून, २००१६ में समाप्त हुआ| ततसमय संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका इबोला संकट को दूर करने में प्रमुख रही, पर कोरोना वायरस के निदान में अब तक उसकी प्रमुख भूमिका नहीं रही है| आज अमेरिका कोरोना वायरस से प्रभावित सबसे बड़ा देश है, जहां इससे संक्रमित मरीजों की संख्या साढ़े सोलह लाख है और इससे मृतकों की एक लाख के करीब है|

याद कीजिये, २० जनवरी, २०१७ को डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के ४५ वें राष्ट्रपति बनने से पहले आगामी महामारियों के संबंध में जो चेतावनियां दी गयी थीं, उन्हें अनदेखा किया गया | ६४ वर्ष पहले संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थापित (१९५५ ) एलर्जी एवं संक्रामक रोग के राष्ट्रीय संस्थान (एनआइएआइडी) के वर्तमान निदेशक डॉ एंथनी फाउची, जो प्रमुख अमेरिकी चिकित्सक एवं प्रतिरक्षा विज्ञानी ने भी ऐसी ही चेतावनी दी थी | वे जनवरी, २०२० से व्हाइट हाउस कोरोना वायरस टास्क फोर्स के प्रमुख सदस्य हैं|

डॉ फाउची ने वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सहित अब तक छह अमेरिकी राष्ट्रपतियों- रोनाल्ड रीगन, जॉर्ज बुश, बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा को एचआइवी/ एड्स एवं अन्य घरेलू और वैश्विक स्वास्थ्य के मुद्दों पर कामयाब सलाह दी है| वे वर्ष १९८४ से अब तक एनआइएआइडी के निदेशक पद पर हैं| उन्होंने ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से पहले जनवरी, २०१७ के आरंभ में एक ऐसे ही आकस्मिक प्रकोप की चेतावनी दी थी और उन्होंने यह भी कहा था कि महामारी से बचने के लिए कहीं अधिक तैयारी की आवश्यकता है| उन्होंने जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर में ‘पैनडेमिक प्रीपेयर्डनेस इन द नेक्स्ट यूएस प्रेसिडेंशियल एडमिनिस्ट्रेशन’ शीर्षक विषय पर दिये अपने भाषण में कहा था कि आगामी प्रशासन के लिए संक्रामक रोगों का कार्यक्षेत्र चुनौतीपूर्ण होगा| उनके द्वारा कोरोना वायरस के तीन वर्ष पहले महामारी के जिस अचानक प्रादुर्भाव की उन्होंने जो चेतावनी दी थी वो कोविड-१९ ही संभावित था , वह आज बिल्कुल सही निकली|

तब इस संक्रामक रोग को रोकने के लिए जिस धनराशि की आवश्यकता थी, उसे समय पर प्रदान नहीं किया गया| डॉ फाउची को २०१६ के ग्रीष्म में जीका वायरस के फैलने के समय का अनुभव था| उन्होंने जब राष्ट्रपति से फरवरी में इसके लिए १.९ बिलियन डॉलर देने को कहा, तो यह राशि सितम्बर तक प्राप्त नहीं हुई | डॉ फाउची सहित जिन विशेषज्ञों ने इस महामारी की चेतावनी दी थी, उस पर अमेरिका ने ध्यान नहीं दिया|

सबको मालूम है कोरोना वायरस चीन के वुहान शहर से फैला| चीन के वुहान सेंट्रल अस्पताल के नेत्र चिकित्सक डॉ ली वेन लियांग ने ३० दिसंबर, २०१९ को अपने साथी डॉक्टरों को एक चैट ग्रुप में भेजे गये अपने संदेश में इस वायरस के संभावित खतरों के बारे में बताया था और यह चेतावनी दी थी कि इससे बचने के लिए वे खास प्रकार के हिफाजती कपड़े पहनें और संक्रमण से बचने के लिए जरूरी सावधानी बरतें| इस पर गौर करने की जगह डॉ ली पर अफवाह फैलाने का आरोप लगाया गया और उन्हें उस पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा गया था, जिसमें गलत सूचना देने के आरोप के साथ उसके कारण समाज में भय फैलाने की बात कही गयी थी| कहा जा रहा है डॉ ली बाद में कोरोना वायरस से संक्रमित हुए और १० जनवरी को अस्पताल में भर्ती हुए, ७ फरवरी, २०२० को डॉ ली वेन लियांग की कोरोना वायरस से संदिग्ध मृत्यु हो गयी|

याद रहे, उनके अस्पताल में भर्ती होने के दस दिन बाद चीन ने कोरोना वायरस के कारण आपातकाल की घोषणा की| अमेरिका और चीन ने अगर पहले ही ये चेतावनियां सुनी होतीं और इन्हें ध्यान में रखकर कार्य किया होता, तो कोरोना वायरस का ऐसा कहर दिखायी नहीं देता| भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी वक्त रहते इन चेतावनियों पर ध्यान दिया होता, परिणाम कुछ और होता|