वाराणसी: भारत के इतिहास का यह महत्वपूर्ण संकेत है कि प्रत्येक पतन के बाद जब-जब देश ऊपर उठा है तब तब सर्वप्रथम आध्यात्मिक पुनरुत्थान हुआ है उसके पश्चात सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक नवोत्थान का क्रम आता है। ऐसे में महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने आर्यसमाज आंदोलन के द्वारा हिन्दू समाज की चेतना को झकझोरा और कहा कि मूल से हटोगे तो कट जाओगे, नष्ट हो जाओगे इसके लिए उन्होंने ऐसे विद्वान तैयार किये जो बाइबिल कुरान का गहरा अध्ययन कर ईसाई पादरियों और मौलवियों को शास्त्रार्थ के लिए ललकार कर उन्हें अपने सबल तर्को से परास्त कर समाज मे स्वाभिमान की भावना को जगाया.

आगे यही कार्य स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने भारत मे विद्यमान सभी उपासना पद्धतियों से उपासना कर अंतिम गन्तव्य का साक्षात्कार किया और हिन्दू संस्कृति के आधारभूत सिद्धांत “एकं सत विप्रा: बहुधा वदन्ति” को प्रत्यक्ष प्रमाणित कर दिखाया उसके बाद उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद ने शिकागो की धर्म सभा में हिन्दू धर्म की सर्वश्रेष्ठता प्रतिस्थापित कर हिन्दू समाज की रगों में विद्युत संचार किया और परिणामतः देश में अनेक सामाजिक आर्थिक व राजनैतिक आंदोलनों का जन्म हुआ। ये बातें उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की सदस्य मीना चौबे ने कहींl उन्होंने कहा कि किसी भी काल खण्ड में स्त्री व पुरुष की उपादेयता बराबर की रही जो कि स्वामी विवेकानंद जी के एक सभा के वक्तव्य से मिलता भी हैl

“एक बार स्वामी जी ने इंग्लैंड में युवकों की सभा में कहा कि “निष्ठा पूर्वक अपना जीवन समर्पित करने वाले दस युवक भी यदि मिल जाएं तो ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’ वाली उक्ति को सच कर दिखाना कोई कठिन काम नही है। “तब भगिनी निवेदिता ने उनसे पूछा “उन दस युवकों में मैं भी एक रहूंगी न?” तब स्वामी जी ने कहा गरुण कितना ही सशक्त पक्षी क्यों न हो, उसे उड़ने के लिए दो सशक्त पंखों की आवश्यकता होती है। वह न तो एक पंख के सहारे उड़ सकता है और न ही उसका कोई एक पंख कमजोर रह सकता है। अतः भारत रूपी गरुण पक्षी को उड़ान भरना है तो स्त्री व पुरुष दोनों पंखों को बलवान होना आवश्यक है और यह कोई महज संयोग नहीं हो सकता कि उस सिंह पुरुष के सबल सक्षम समुन्नत भारत के स्वप्न्न को पूरा करने के लिए दो महान आत्माओं ने जन्म लिया जिन्होंने पुरुष और स्त्री इन दोनों पंखों को सशक्त बनाने के लिए दो प्रभावी संगठनों को जन्म दिया जिसमें एक थे नागपुर के परम पूज्य डॉक्टर केशव बलिराम हेडगवार जी जिन्होंने सन 1925 में विजय दशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नामक संगठन को जन्म दिया और दूसरी थी नागपुर में ही जन्मी वर्धा में ब्याही परमपूज्या लक्ष्मीबाई केलकर जी जिन्होंने सन 1936 में विजयादशमी के दिन राष्ट्र सेविका समिति नामक महिला संगठन की नींव रखी और आज यह वटवृक्ष बन समान रूप से गृह पक्षी के महिला और पुरुष रूपी पंखों को सशक्त बनाने के कार्य में जीवन का क्षण-क्षण रक्त का हर कान कण समर्पित कर रहा संगठन है और अब वह दिन दूर नही जब दोनों ससक्त पंखों के सहारे उड़ान भरकर परमवैभव सम्पन्न भारत विश्वघोष करेगा।