खेल यहां से प्रारंभ होता है…
आपने टेंडर डाला रेलवे में ।टेंडर मिल जाता है । लेकिन  एग्रीमेंट महिला कल्याण संगठन अपने नाम कराता है जबकि रेलवे के नियम में कहीं भी इसका जिक्र नहीं है। फिर भी चल रहा है। अब आप कह सकते हैं चलती का नाम रेलगाड़ी है।
जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का’
अब ये जान लीजिए की महिलाा कल्याण संगठन में किनकी घरवाली अध्यक्ष होती हैं। रेल में सिर्फ रेल अधिकारियों की पत्नी के द्वारा यह संस्था चलाई जाती है। संभवत: यह अंग्रेजों के समय शुरू की गई थी। संगठन डिविजन व जोन दो स्तरों पर होता है। डिविजन में संगठन की अध्यक्ष डीआरएम की पत्नी होती हैं। वहीं जोन स्तर पर महाप्रबंधक की पत्नी अध्यक्ष होती हैं। संगठन रेल अस्पतालों में भर्ती मरीजों की मदद करता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम और जागरूकता कार्यक्रम भी चलाता है। लेकिन इसी चलने चलाने में भ्रष्टाचार भी चलता रहता है।

महिला संगठन के अवैध काली कमाई के स्रोत

1. दुकान : डीआरएम कार्यालय या रेलवे कॉलोनियों में कई जगह जेनरल स्टोर्स चल रहे हैं। एग्रीमेंट महिला संगठन के नाम से है। किराया वही वसूलता है।

2. कैंटीन : स्टेशन, डीआरएम व जोनल कार्यालय में कैंटीन चल रही हैं। किराया संगठन वसूलता है। हाजीपुर जोनल दफ्तर में ऐसे दो बड़े कैंटीन हैं।

3. स्कूल : रेलवे कॉलोनियों के खाली भवनों में स्कूल चलते हैं। आय संगठन के खाते में जाती है। सोनपुर में ऐसा ही स्कूल प्ले एंड लर्न नाम से चल रहा है।

4. आरओ प्लांट : संगठन के कई जगह आरओ प्लांट हैं। जिन दुकानों, कैंटीन व अन्य स्रोतों से किराया लिया जाता है उसकी रसीद नहीं दी जाती है।

5. वेतन से कटौती : कर्मियों की गाढ़ी कमाई भी संगठन के खाते में जाती है। हर कर्मचारी के वेतन से 20 रुपए प्रति माह वेलफेयर के नाम से वसूलते जाते हैं। इन पैसों को संगठन अपने अनुसार खर्च करता है।


यहां बोलना मना है…

खगौल के रंजीत मिश्रा को 2013 में सुधा पार्लर के लिए डीआरएम दफ्तर के सामने मंजूरी मिली थी। हालांकि यह पटना डेयरी को मिली थी जिसे डेयरी ने रंजीत को सौंपी। हर महीने महिला संगठन वाले किराया मांगने लगे। रसीद मांगी तो धमकाया गया। किराया देना बंद किया तो दुकान को अवैध बताकर तोड़ दिया। 6 अन्य सील कर दी गईं।

है ना रेलवे में भ्रष्टाचार का रेला,उपर से नीचे तक चलता है यह खेल। कायदे से इसकी जांच माननीय रेल मंत्री को करवानी चाहिए।