शिक्षक दिवस पर आज पेपर-पत्रिका, टीवी चैनल और वेब न्यूज पोर्टल पर शिक्षकों को बधाई देने का सिलसिला जारी है। दिया भी जाना चाहिए। समाज में उनकी भूमिका से कोई इंकार भी नहीं कर सकता।

लेकिन क्या सरकार और सिस्टम को इनकी परवाह है?

आज की तारीख में अगर लाखों शिक्षक आन्दोलन करने के लिए आमादा हैं तो- कुछ तो मजबूरियां रही होगी, कोई यों ही बेवफा नहीं होता।

कहते हैं कानून अंधा होता है।सच्चाई तो ये है कि यहां कानून के साथ-साथ सरकार और सिस्टम भी अंधा और बहरा है। मन की बात करने वाले मोदी जी को भी फिक्र नहीं है।

सरकार कहती है नियोजित शिक्षकों को पैसा देने के लिए पैसा नहीं है।न्यायालय कहता है मामला कॉन्ट्रैक्ट का है। सवाल ये है कि आखिर आप ऐसी व्यवस्था लाते क्यों हैं जो सिस्टम में अव्यवस्था पैदा कर दे।

सरल भाषा में समझिए। एक ही विद्यालय में एक शिक्षक साठ  हजार रूपये उठाता है तो दूसरा आधा से भी कम।जहां तक काम का सवाल है तो ज्यादा वेतनभोगी से नियोजित शिक्षकों को अधिक काम करना पड़ता है। हालांकि आज की तारीख में हर विभाग का हाल ऐसा ही है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था का हाल देखिये।आज नियोजित शिक्षकों को अपनी मांग रखने के लिए जगह भी नहीं दी जा रही है। ऐसा तब जब आन्दोलन की उपज आज सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं।

सरकार को चाहिए था कि शिक्षक दिवस पर शुभकामना देने की जगह उन शिक्षकों से बात कर लेते जो आज आंदोलन कर रहे हैं।शायद यही राधाकृष्णन जी के प्रति सच्चा प्रेम होता।