“आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः”॥
आहार, निद्रा, भय और मैथुन आदि प्रवृतियां मनुष्य और पशु में समान होती है। धर्म ही मनुष्य को अलग करता है। धर्म से रहित मनुष्य पशु के समान है। प्रत्येक धर्म प्रवर्तक, प्रत्येक दार्शनिक और उपासना पद्धति का प्रयास मनुष्य की पशु प्रवृतियों का दमन और देव प्रवृतियों का उन्नयन रहा है। हमारे प्राचीन वाङ्गमय में यम यमी संवाद बताते है कि किस प्रकार नारी पुरुष के सम्बन्धो को मर्यादाओ के क्रम में बांधा गया है। विवाह संस्था को पवित्र बनाकर नारी को पति व्रत और पुरुष को पत्नीव्रत के आदर्श पर अडिग रहने का संस्कार दिया गया।अपनी पत्नी के अतिरिक्त अन्य किसी स्त्रियों को माता बहन या बेटी के रूप में देखने की प्रेरणा दी गयी। भैयादूज, रक्षाबंधन, करवा चौथ, तीज व्रत आदि अनेक पर्व यही संस्कार देने की सामाजिक प्रक्रिया है। विवाह संस्कार में सप्तपदी व सात वचन नारी पुरुष सम्बन्धो को मर्यादाओं में वचनबद्ध करने की पद्धति है। मअर्धनारीश्वर और अर्धागिनी जैसी अवधारणाएं यह बोध कराती है कि नारी और पुरुष एक दूसरे के पूरक है। विकल्प या प्रतिद्वंदी नही।मानव जाति के सभ्यता का प्रवाह उनदोनो के संयुक्त प्रयास से ही आगे बढ़ता है। प्राचीन भारतीय वाङ्गमय में नारी पुरुष संबंधों का जितना बेबाक व निर्भीकता के साथ विवेचन हुआ है उतना विश्व के किसी प्राचीन वाङ्गमय में नही मिलेगा। नर और नारी की शारीरिक व मानसिक बनावट के समान व असमान पहलुओं की जो जानकारी वहां उपलब्ध है, वह अत्यंत वैज्ञानिक व अनुभूति परक है। मैं यहां कहना चाहूंगी कि समाज के विकृतियों की भारतीय परिपेक्ष्य में समीक्षा होनी चाहिए न कि नारी मुक्ति व टीवी चैनलों व विज्ञापनों को आधार बनाकर जो कि भारतीय समाज का यथार्थ न होकर पश्चिमी सभ्यता की समृद्धि विलासिता और स्वेच्छाचारिता की प्रस्तुति जिससे परिवार विखंडन को आगे बढ़ता है। अपने महिला आयोग के विगत 2 वर्षों के कार्यकाल के महिलाओ के जनसुनवाईयों व पीड़ितो की समस्याओं को सुनकर जिस भारतीय स्वस्थ्य समाज की परिकल्पना को हम सब देखना चाहते हैं वह कहीं विलुप्त नजर आ रहा है।जिससे मन को बेहद पीड़ा पहुँचती है।जिसकी भरपाई बेहद मुश्किल है।सभी समस्याओं का समाधान कानूनी दण्ड विधा नहीं होती बल्कि आपसी पारिवारिक परवरिश सूझबूझ व संस्कार जिससे प्रत्येक परिवार पोषित हो और मेरा मानना है कि अगर स्त्री कही भी पीड़ित होती है तो उसमें बहुतायत हाथ परिवार के किसी स्त्री का ही होता है। जो कि गम्भीर विषय है। क्योंकि परिवार व्यवस्था की धुरी में विभिन्न रूपों सम्बन्धो की स्त्री ही होती है। अगर परिवार के किसी स्त्री की व्यथा में परिवार की सभी स्त्रियों में एका भाव हो तो किसी पुरुष की क्या मजाल जो प्रताड़ित करें। आज मैं अपनी कलम को विराम देने से पहले आग्रह करूंगी कि जहाँ कही यह भारतीय परिवार व्यवस्था बची हो उसको सहजता प्रसन्नता के साथ मां बेटी, सास, बहू, नंद, भाभी, देवरानी जिठानी, सहित अनेक रिस्तो को “मान (आदर) दीजिये तभी आप सशक्त बन पाएंगी और तभी जननी को जननी के जन्म देने से भय नही लगेगा और कोई बिटिया प्रताड़ित नही होगी कोई बिटिया मारी नहीं जाएगी।

साभार – मीना चौबे, सदस्य, राज्य महिला आयोग / सम्पादक, नारी जागरण पत्रिका