मऊ/ उमाशंकर। बुनकरों की जिंदगी चरखे की रफ्तार के साथ घूमती है। बुनकरों को उम्मीद थी कि अब उनके अच्छे दिन आएंगे उनकी स्थिति दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही है। जिसके चलते हधकरगा उद्योग ठप होने की कगार पर है और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है।

देश के पहले प्रधानमंत्री पं.जवाहर लाल नेहरू ने मऊ को भारत का मैनचेस्टर कहा था। मऊ में हथकरघा उद्योग की शुरूआत 16वीं सदी में मानी जाती है। मऊ जनपद बुनकर बाहुल्य इलाका है, यहां लाखों की तादाद में बुनकर काम करते हैं।

लेकिन यहां के बुनकर खाड़ी देशों में पलायन करने को मजबूर हैं। हजारों की तादाद में यहां से बुनकर खाड़ी देशों में रोजी-रोटी की जुगाड़ में जद्दोजहद कर रहे हैं। सरकारें बुनकरो के लिए घोषणाएं करके सस्ते बस्ते में डाल देती हैं और उन योजनाओं का लाभ किसको मिलता है यह तो सरकारें ही बता सकती हैं।

आज मऊ के बुनकरों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई है कि वे पैसे के आभाव में बच्चों की पढ़ाई अपने परिवार का भरण पोषण और उनके इलाज से भी वंचित हैं।मऊ के बुनकरो का कहना है कि इस साड़ी कारोबार में हम लोगों को बहुत सारी पेरशानियां उठानी पड़ती हैं। सबसे बडी समस्या बिजली की है, जिसका कोई निर्धारित समय निश्चित नहीं है।

रात में दो बजे बिजली आने पर भी उन्हें उठकर लूम चलाना पड़ता है। इस मंदी के समय में बुनकर एक पैसा भी नही बचा पा रहे है, जिसकी वजह से वे अपने बच्चों की शादी तक करने की स्थिति में नहीं है।

बुनाई के काम से अपने परिवार का भरण पोषण करने वाले वलीदपुर निवासी सिराजुद्दीन बताते हैं कि बिजली नहीं मिलने की वजह से बुनाई का काम कम हो रहा है जिसकी वजह से परिवार पालना मुश्किल हो रहा है। वहीं परिवार के कई सदस्य दूसरे शहरों में जाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

बिजली के लेकर सरकारी फरमान पर बताया कि नियमित बिजली मिले तो कारोबार में बढ़ोत्तरी होगी। उन्होंनें बताया कि बजली की समस्या खत्म हो जाए तो इलाका खुशहाल हो जाएगा।वलीदपुर में बुनकर का काम करने वाले केदार बताते हैं कि दिनभर काम करने के बाद करीब 150 रुपए की कमाई होती है इस पैसे में आखिर कैसे परिवार का पालन पोषण होगा। केदार कश्मकश की जिंदगी जी रहे हैं। केदार बताते हैं कि सरकार सिर्फ जुमला सुनाती है बड़े बड़े वादे करती है लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि हम जैसे लोगों को किसी तरह की कोई सहायता नहीं मिली है।

वलीदपुर के बुनकर इलियास असगर अंसारी बताते हैं कि बुनकर के काम में मेहनत ज्यादा है और मजदूरी कम है। उन्होंने बताया कि सरकार अगर सहायता करे तो इस काम को और बेहतर किया जा सकता है। साथ ही उन्होंने बताया अगर बिजली का बिल सस्ता हो जाए तो ।

जफर अकील सभासद, वलीदपुर ने बताया कि आज से करीब 15 साल पहले बुनकर उद्योग की स्थिती बेहतर थी जिसकी वजह से इस इलाके के लोग बाहर के शहरों में पलायन नहीं करते थे। 4 से 5 घंटे काम करने के बाद आराम से रहते थे लेकिन अब स्थिती बेहतर से बदतर हो चुकी है। महंगाई से इस उद्योग की कमर टूट चुकी है। उन्होंने बताया कि धागे का रेट बढ़ने से कारोबार में दिन प्रतिदिन गिरावट आ रही है।वहीं जीएसटी ने कमर तोड़ रखी है आलम ये है कि बच्चों की पढ़ाई तक रोकनी पड़ी। सरकार के वादों इरादों पर सवाल उठाते हुए अकील ने कहा कि सरकार सिर्फ जुमला पढ़ती है।

सरकार सस्ती बिजली, कैंप लगाकर लोगों को ट्रेंड करने की सिर्फ बात करती है। अगर ऐसा होता हे तो बुनकरों के अच्छे दिन आ सकते हैं। अकील ने सरकार से अपील की कि जुमले कम करे, बुनकरों के बिल को कम करे और इलाके में ज्यादा से ज्यादा बिजली मुहैया कराए जिससे हथकरघा उद्योग को बढ़ावा मिल सके और बुनकरों के दिन संवर सकें।

बनारसी साड़ी के व्यापारी जमशेद बताते हैं कि हम सरकार को टैक्स दे रहे हैं और सरकार हमारे साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। इलाके में बिजली कब आती है किसी को पता नहीं। जिसकी वजह से बुनकर उद्योग ठप है। जीवन यापन करना मुश्किल हो रहा है। जमशेद ने सरकार से अपील किया कि अगर सस्ती बिजली मिले, बुनकर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए फैसिलिटी दे, सब्सिडाइज लोन मुहैया कराए तो निश्चित तौर पर इस उद्योग में इजाफा होगा।

मजदूरी को लेकर जमशेद ने बताया कि एक बनारसी साड़ी को बुनने में करीब दो से ढाई दिन लगते हैं और और एक साड़ी पर 300 रुपया मिलता है अब सवाल ये है कि क्या एक परिवार सवा सौ या डेढ़ सौ में अपने परिवार का भरण पोषण कर पाएगा।

मुबारकपुर में बनी साड़ी पूरे देश में बनारसी साड़ी के नाम से मशहूर है। यहां की साड़िया देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी पहचान बनाए हैं, लेकिन अगर यही हालत रहा तो आने वाले समय में ताने बाने का यह शहर अपनी पहचान जरूर खो देगा।