पटना: बहुत दिनों के बाद हिंदी रंगमंच पर एक ऐसी प्नस्तुति देखने को मिली जिसमें एक्शन, ड्रामा और रोमांस, सबकुछ था।

स्थान था पटना का प्रेमचंद्र रंगशाला । और  नाटक था कुंवर सिंह की प्रेम कथा। चौक गये ना। दरअसल आपका आश्चर्य करना भी लाजिमी है क्योंकि अब तक दुनिया बाबू वीर कुंवर सिंह की वीरगाथा से ही परिचित है।

लेकिन बाबू साहब के वीररस से ओतप्रोत जीवन में से प्रेम रस को कलमबद्ध करने वाले पत्रकार, लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव ने बड़ी ही बारीकी से नाटक का रूप दिया है।

परिकल्पना एवं निर्देशन में रामकुमार मोनार्क ने जान डाल दी है। मोनार्क ने कुंवर सिंह की वीरगाथा और प्रेम रस में बड़ा ही बेहतर सामंजस्य बैठाया है।

नाटक 1857 के गदर के इर्दगिर्द रची गई सच्ची कहानी है। नाटक में दिखाया गया कि एक मुस्लिम परिवार की नर्तकी वीर कुंवर सिंह के जीवन में आती है। कुंवर सिंह और धरमन की सच्चा प्यार कभी अपेक्षा नहीं करता, बल्कि त्याग और समर्पण का नया इतिहास रचता है। धरमन और करमन रणक्षेत्र में भी अपनी हुनर की लोहा मनवायी और भारत माता की गुलामी की जंजीरों को काटती हुई वीरगति को प्राप्त हुई।

जहां तक कलाकारों का सवाल है तो सभी ने अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से जीया। लाइटिंग, रूपसज्जा और संगीत नाटक की भव्यता को और भव्य बना रहे थे। कुल मिलाकर नाटक के शौकीन लोगों को कुंवर सिंह की प्रेमकथा लंबे समय तक हौले-हौले अपने प्रेम रस में उतारते रहेगी।