वाराणसी। “आत्म दीपो भव” बुद्ध का एक महत्त्वपूर्ण विचार है जिसका अर्थ है “अपना दीपक स्वयं बनो” अर्थात व्यक्ति को अपने जीवन का उद्देश्य या किसी नैतिक, अनैतिक का फैसला स्वयं लेना चाहिये, किसी दूसरे की मुँह नही देखना चाहिये। इस विचार में निहित है कि बुद्ध हर व्यक्ति की क्षमताओं में विश्वास रखते हैं और यही विश्वास किसी लोकतंत्र के मूल में भी होता है। नारी सशक्तिकरण का प्रथम आशय ही इसी “आत्मदीपो” से शुरू होनी है। अपने मन के हीन भावना की गांठ को खोलना, ताकि कोई भी युवा पीढ़ी नारी के कर्तव्यों से विमुख होने का मन न बनाएं और वे स्वयं अपना विकास पुरुष बनाने की ओर न कर स्वयं नारी अपने मानवीय रूप को स्वीकार करे। तदपि मैं कहना चाहूंगी कि नारी समस्या को मात्र उसकी समस्या मनाने की भूल समाजोत्कर्ष के लिए सही नही है। नारी केवल समाजिक समस्याओ से जूझने के लिए मात्र नारी संगठनों को आगे बढ़ाने से बात नही बनेगी। उल्टा समाज बंटता जाएगा और हर घर में अखाड़े खड़े हो जाएगें। स्त्री पुरुष में टकराव की स्थिति समाज के स्वस्थ विकास में साधक नहीं हो सकता और न स्वयं स्त्री का कल्याण ही हो सकता है। इसलिए सशक्तिकरण में यह भी प्रयास होना चाहिए कि नारी की समस्या और उपलब्धियों को सम्पूर्ण समाज की उपलब्धि व समस्या बन सके। नारी सशक्तिकरण के नाम पर उसे पुरुष, परिवार और समाज से अलग न करें। क्योंकि दोनो एक दूसरे के पूरक हैं प्रतिद्वंदी नहीं। भारतीय समाज का सिद्धांत और व्यवहार पूरकता के आधार पर है। जीवन के हर क्षेत्र में पूरकता है। नारी की सकारात्मक भूमिका को उजागर कर ही हम उसके मन की हीन भाव को समाप्त कर सकते हैं, उसके कर्तव्यों के प्रति उनके मन मे स्वाभिमान भाव भी डाल सकते हैं। पिछले दशकों से महिला आयोग महिला थाना परिवार, न्यायालय, परिवार परामर्श केंद्र राष्ट्रीय महिला कोष जैसे निकायों के गठन का उद्देश्य स्त्रियों के अधिकारों को संरक्षा तथा संरक्षण प्रदान करना ही रहा है तथा समय समय पर स्त्रियों से सम्बंधित सामाजिक कानूनों की समीक्षा करके उन्हें अधिक कड़ा बनाया गया। जिसमे भ्रूण हत्या रोकने हेतु गर्भजल परीक्षण अधिनियम नाबालिग बच्चे पर माँ का स्वाभाविक संरक्षकत्व पैतृक सम्पदा में अधिकार ट्रिपल तलाक सहित अनेकों महिला हितों की कानूनी अधिकार दिए गए। परन्तु आज भी समाज मे भारतीय नारी की एक परिभाषा न होना खेद का विषय है। छोटी-छोटी बातों से बनती है बड़ी बात नारी को सशक्त बनने के लिए स्वयं को जगाना होगा। अपने मूल्यों के साथ अधिकारों के साथ स्वयं को शिक्षित स्वावलंबी करते हुए आगे बढाना होगा। साथ ही समाज को भी नारी के प्रति अपने संकीर्ण नजरिये को बदलते हुए उन्हें समाज जीवन मे छोटी छोटी बातों को उदार हृदय से ध्यान देना होगा और इन्हीं आदतों में परिवर्तन लाने का नाम होगा वास्तविक महिला सशक्तिकरण।

साभार – मीना चौबे, सदस्य राज्य महिला आयोग और सम्पादक, नारी जागरण पत्रिका