वाराणसी। नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।। अर्थात माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है।  परमात्मा की सृष्टि साधना अपने चरम पर पहुँची तो उसके परिणाम स्वरूप संसार ने पाया माँ और मां ने सृजन किया मनुष्य का और मनुष्य अपनी साधना के चरम पर पहुंचा तो उसे मिला परमात्मा। हमारे ऋषियों ने इसका भाष्य किया “परमात्मा की चरम साधना की सिद्धि है माँ और माँ के तप का प्रतिफल है मनुष्य। हाँ वही मनुष्य जिसके लिए स्वामी विवेकानंद जी बार बार प्रार्थना के लिए कहते है कि माँ मुझे मनुष्य बना दो। मनुष्य यानी दुर्बलता का पुरुषता से दूर मनुसत्व (मनुष्य )भाव। तब मन में प्रश्न उठता है कि कैसी होती है माँ ।परमात्मा नें माँ बनाया तो मनुष्य को परमात्मज्ञान जिस प्रक्रिया व जिस विद्या के माध्यम से होता है उस विद्या व प्रक्रिया का सृजन करती है माँ।दौड़ने भागने आकाश में उड़ने, पाताल की थाह लेने की, प्रकृति, पाताल और धरती का रहस्य जान लेने की उपलब्धि ही नहीं बल्कि सृजन है वह माँ ही है। इन समस्त भौतिक अभौतिक उपलब्धियों का प्रेरकतत्व।तब स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि कैसी होती है माँ की साधना ? एक माँ होने के नाते इतना तो जरूर कहूंगी कि बहुत ही कष्टसाध्य। अत्यंत ही आत्मविलोपी जो एकांत की यातना का संताप नही जानता वह मां की ममता को नही जान सकता। माँ उत्सर्ग और बलिदान, अनामता और मौन साधना की देवी है, बीज के बोने, उसके वृक्ष बनने, उसके फलफूल लगने, फल के पकने और उसका स्वाद चखने तक की समस्त विकास प्रक्रिया के साक्षी होने का धीरज और संतोष का भाव है माँ की साधना। ठीक वैसे ही जैसे प्रभु श्री राम को राज्य सिहांसन का त्याग करके वन वन भटकना पड़ा, ठीक उसी प्रकार जैसे कभी सिद्धार्थ अपना राजपाठ त्याग कर गया में वटवृक्ष के नीचे बैठ गए कि “चाहे मृत्यु मेंरे शरीर का नाश भले ही कर दे किंतु मैं सृष्टि बोध प्राप्त किये बिना नही उठूंगा, “उसी प्रकार जैसे पूज्यपाद शंकराचार्य जी केरल के कलाड़ी से कश्मीर की ओर चल पड़े थे। सीता माता की तरह अग्निपरीक्षा देते रहने जैसा यह मातृधर्म। जब प्रभु श्रीराम राजा होकर भी राजा भाव से मुक्त रहते है तभी रामराज्य बनता है।जब कुंती अपने पुत्र पांडवों के साथ वन वन भटकती है तभी धर्मराज्य की स्थापना होती है। सिद्धार्थ तप करते है तभी बुद्ध बनते है और वह वृक्ष बोधि वृक्ष बन जाता है। अपना रक्त मांस सुखाए गलाये बिना मातृत्व की साधना सम्भव ही नही है। माँ द्वारा गर्भधारण करना, गर्भस्थ शिशु को पालना, प्रसव पीड़ा को सहर्ष व सुखद भाव से झेलने जैसी सिद्धता मां के अतिरिक्त और किसी में भी नही होती। जो अपने किये गए या किये जा रहे कार्य की ढोल पीटता है वह ढोल तो पिट सकता है, उसका शोर भी लोग सुन सकते है, और सुनेंगे भी, किंतु उसमें से किसी सार्थक, सकारात्मक, मंगलमय का जन्म कदापि सम्भव नही।

इसलिए भारतीय मनीषा की चिंतनधारा भले ही भिन्न भिन्न रही परन्तु उनका चिंतन एकमेव है, एक स्थान पर जाकर वह यही स्वीकार करते है कि नास्ति मातृसम छाया —
या मातृरूपेण संस्थिता अर्थात भारतीय नारी की प्रतिष्ठा मातृरूप में ही है इसलिए प्रत्येक मातृशक्ति को गौरव बोध के साथ अपने मातृत्वमय कर्तव्यों को सहर्ष अभिरुचि पूर्वक संभाले रखना चाहिए ।
साभार – मीना चौबे, सदस्य, राज्य महिला आयोग / सम्पादक नारी जागरण पत्रिका