यह दिन केवल शिक्षक गुरुजनों को प्रणाम और एक – दूसरे को बधाई देने की रस्म अदायगी भर का दिवस नहीं है, बल्कि यह विचारने का दिन है कि राष्ट्र निर्माण एवं विश्व समृद्धि के लिए सबसे जरूरी घटक *शिक्षा व विद्या* की प्रतिष्ठा और उसमें मूल्यों की अभिवृद्धि के लिए हम कितना कुछ कर पा रहे हैं? कितने ठोस प्रयत्न कर पा रहे हैं?

आज हमें यह भी चिन्तन करना चाहिए कि हमारा वास्तविक निर्माण करने वाले अपने जीवित बचे अध्यापकों को क्या हम उतना आदर व महत्व देते हैं, जितना ढेरों असत्य बोलने वाले राजनेताओं, बनावटी जीवन जीने वाली फिल्मी हस्तियों, पैसे के लिए किसी भी घातक वस्तु का प्रचार करने को तैयार हो जाने वाले खिलाड़ियों और अनेक बदनामियों से घिर गए सन्तों को देते हैं?

यदि ऐसा नहीं है तो आज के दिन कुछ देर आंख बन्द कर सोचें अवश्य। जहां सुधार करना हो, अवश्य करें।आज गुरु पदों पर आसीन शिक्षक भी इस तथ्य पर सोचें – विचारें अवश्य कि विद्यार्थियों के दिलों में सम्मान की कमी के कारण क्या – क्या हो सकते हैं? क्या वह खुद ही तो इसके लिए दोषी नहीं हैं? कुछ देर चिन्तन करें कि वर्ष १९८० के पहले बेहद कम वेतन पर सेवा कार्य करने वाले शिक्षकों को जो सम्मान उन्हें अपने विद्यार्थी से मिलता था,

लगभग ८० से १५० गुना तक बढ़ी तनख्वाह मिलने पर भी वैसा सम्मान आज का छात्र आपको क्यों नहीं दे पा रहा? बड़े – बड़े आंदोलन चलाने वाले प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय शिक्षक संघ तथा विधान परिषदों में शिक्षा जगत का प्रतिनिधित्व करने वाले स्वजन भी अपनी भूमिका पर खुद सवाल जरूर उठाएं और जहां कहीं सुधार लाने की जरूरत हो, अवश्य उठाएं।

*शिक्षा और संस्कार* हमारी भारतीय संस्कृति का मूल सूत्र रहा है। अब वह नारा बन गया है – *शिक्षा और रोजगार*। चलो! संस्कार की बात तो जाने दें, हमारे देश के शिक्षक, छात्र, अभिभावक, शिक्षा अधिकारी, शिक्षाविद्, शिक्षा की नीतियों का निर्धारण करने वाले नीति – निर्धारक तथा शासन सत्ता के संचालक स्वजन, सभी इस बात पर भी विचार अवश्य करें कि क्या चतुर्थ औद्योगिक क्रांति की ओर तेजी से बढ़ते विश्व के सम्मुख हमारी भारतीय शिक्षा व्यवस्था द्वितीय औद्योगिक क्रांति के सूत्रों पर ही तो नहीं अटकी है?

हमारे देश में बढ़ती बेरोजगारी का मुख्य कारण कदाचित यही तो नहीं है? आइए ! इस साल यानी २०१९ के *शिक्षक दिवस* को हम सब *विचारण दिवस* के रूप में मनावें। छात्र, अध्यापक, शिक्षाधिकारी, शासक, राजनेता, चिन्तक, विचारक, लेखक, कवि, लोकसेवा में लगे संगठन सभी शिक्षा और विद्या को उनके मौलिक स्वरूप में प्रतिष्ठापित करने का अभियान चलाएं।