मऊ। देश आजाद होने के बाद से घोसी ससंदीय सीट पर पहली बार लाखों वोट से चुनाव जीतने के बाद भी सांसद अतुल राय को दिल्ली की कुर्सी नसीब नहीं हुई। अलबत्ता रामरहीम के गणित में फस कर आशाराम बापू का प्रवचन सुनने जेल चले गये। बेचारी बन कर रह गयी घोसी ससंदीय सीट? महंगी पड़ गयी गठबंधन के फार्मूले में मिली सियासी जीत। आज बाधित है घोसी का विकास, पश्चाताप कर रहें है बुआ बबुआ के सम्मोहन में फँसकर अपनी बर्बादी का खुद ही इन्तजाम करने वाले मतदाता। अब तो हालत यह है कि

खुदा ही मिला न बिशाले सनम?

लावारिस बना यह क्षेत्र सर्वत्र चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग परेशान हैं कि अब क्या होगा घोसी का? क्या फिर चुनाव होगा? लेकिन इसका जबाब सियासतदार भी नहीं दे पा रहे हैं। हर तरफ असमंजस है सियासी खेमों में कसमकस है। लेकिन मामला 6 माह बाद भी जस का तस है। सियासी ग्रहण ऐसा लगा की शपथ ग्रहण तक नहीं हो सका। घोसी के लोग उदास हैं।कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता जब प्रबुद्ध वर्ग इस मसले पर चर्चा न करता हो लोगों के फैसले पर आहे न भरता हो।

बङे मियाँ तो बङे मियाँ छोटे मियाँ सुभान अल्लाह
संसदीय व्यवस्था में आस्था का परचम बुलन्द होकर भी दुर्व्यवस्था के दावानल में झुलस रहा है। बिहार के राज्यपाल फागू चौहान जी की सीट घोसी खाली हो गयी थी। चुनाव हुआ तो फिर सत्ता का प्रादुर्भाव हुआ वरासत कायम हो गयी। व्यवस्था मुलायम हो गयी। महज कुछ वोटों से शाहंशाही कुर्सी नव सीखिए के हाथ चली गयी फिर एक बार घोसी छली गयी।
शिकवा नहीं किसी से किसी से गिला नहीं, तकदीर में नहीं था जो हमको मिला नहीं।
घोसी में सियासत का पहरेदार जिसका आम आदमी के बीच गजब का है व्यवहार चुनाव कैसे गया हार? इस बात को लेकर गांव-गांव बहस हो रही है। पब्लिक रो रही है पश्चाताप के आँसू बहा रही है। सत्ता के महत्ता को जानते हुये भी निर्दलीय चुनाव लड़कर सुधाकर सिंह ने जो ललकार पैदा किया वह आज तक के इतिहास में कहीं नही मिलता। सत्ता की सियासत नहीं होती तो कमल कभी नहीं खिलता। दुर्भाग्य के दो राहे पर खड़ी ससंदीय सीट के लिये सियासी प्रीत की रीत बदल गयी सासंद जेल मे विधायक का काम खतम है सियासी खेल में। आज यह धरती कराह रही है आह भर रही है गुजरे जमाने को याद कर कभी गरजती बुलन्द आवाज संसद में भाषण सुनकर लोग वाह वाह कह उठते थे आनायास ही बाहें फड़कने लगती पूर्वान्चल का शेर कल्पनाथ राय बोल रहे है। आंकड़ों की बाजीगरी से सियासी तराजू पर पूर्वांचल के विकास को तौल रहै है। गजब की वाणी गजब का बोल ? ससंद में बोलते हुये देश में हुये विकास का खोल देते थे पोल। जब भी दिल्ली से मऊ कल्पनाथ राय आते हंगामा मच जाता प्रशासन हाफने लगता पुलिस महकमा कांपने लगता था पब्लिक स्वागत के लिये पागल हो जाती रही थी वह भी एक घोसी के सासंद थे आज भी सांसद है जमीन आसमान का फर्क है। तब घोसी विकास का स्वर्ग था, आज बर्बादी का नर्क है? बस यही तबमे आज में फर्क है।

मगर सब दिन जात न एक समाना आज वही मऊ है वही घोसी है न कोई विकास न आस हर तरफ सियासी परिहास? वही पब्लिक है वही व्यवस्था है किसी का किसी से कोई नहीं वास्ता है। चुनाव भर सियासत की ढपोर शंखी विकास का वास्ता फिर बदल जाता रास्ता है? किसी का कोई कुछ सुनने वाला नहीं? नेता बिजेता बनकर झोली भर रहा है। आम आदमी तबाही में मर रहा है। बदलता परिवेश केवल विद्वेश की ईबारत लिख रहा है। मऊ जो कभी दिल्ली की सियासत में चर्चित नाम था आज गुमनामी मे खो गया। सिसक सिसक कर दम तोड़ रही घोसी की खामोशी? समाप्त होती जा रही हो विकास की खुशी? परिवर्तन के नर्तन में जातिवाद का प्रदर्शन दो दशक से नये तरह का माहौल कायम कर दिया है। अब सांसद विधायक का चुनाव सामाजिक सरोकार पर नहीं जातिवादी पैरोकार पर निर्भर हो गयी है। पार्टियों ने भी यही पैमाना बना लिया है टिकट उन्ही को दिया है जिनकी तादाद की बहुलता रही है। निर्दल चुनाव लड़कर दमदारी साबित करना इस बिगड़े माहौल में सबके बस की बात नहीं, सत्ता से टकराने की सबकी औकात नही? माहौल बदल रहा है शहर गाँव कस्बा सम्हल रहा है। व्यवस्था के बादल सियासी मानसून को पाकर
कहीं सूखा तो कही जम कर बरस रहा है। घोसी विकास के मामले में सूखा ग्रस्त घोषित हो चुका है? हर मामला सरकारी व्यवस्था में वित्तपोषित हो चुका है? आने वाले कल में नवागत विधायक की नजरें इलाके पर इनायत होती है या घोसी की भाग्य लक्ष्मी रोती है? यह तो समय बतायेगा। लेकिन पालने में ही पूत के पांव से पता चल जाता है कि कल क्या होगा? फिलहाल बेहाल मऊ नेता विहीन होकर दन्त विहीन शेर की तरह विकास पुरूष स्व कल्पनाथ राय की बनायी सियासी हवेली में दहाड़ रहा है। लेकिन अपना अपना अलग वजूद कायम करने में पूरी तरह नाकाम है। जब की सरकार अपनी है? अपना इन्तजाम है? समय का पहिया सत्ता की रेत में फिसलकर आगे बढ़ रहा है। देखना है नवागत सत्ताधारी विधायक विजय राजभर जिनको इस इलाके के लोगों ने लखनऊ की रंगीन रियासत में सियासत करने के लिये पक्का लाईसेन्स दे दिया है। राजा नहुष की प्रतापी धरती पर विकास की गंगा अवतरित करते हैं या आसमानी उड़ान में ही ढाई साल कंगाल कर जाते हैं। वक्त पंख लगाकर उड़ रहा है। राष्ट्रीयता के रंग मे देशप्रेम का पानी केसरिया हो चला है। सियासत के समन्दर मे भी आसमानी लहरें उठ रही हैं कब क्या हो जाये कहना मुश्किल है।लेकिन वर्तमान में सौहार्द पूर्ण व्यवस्था कायम रखकर संविधान के सम्मान में समरसता के आवरण में सुरक्षित रहे दिनचर्या में नियमित रहें। यह देश आप का है। परिवेश जैसा बनाएंगे वैसा ही तरक्की का सन्देश दुनियां में जाएगा।

जगदीश सिंह, वरिष्ठ पत्रकार की कलम से