मऊ: भारतीय जनता पार्टी की अथॉरिटी पर सियासत के चुनावी सफर में बिरादरी के बदौलत जीत का सेहरा बांधने वाले पूर्व बिधायक फागू चौहान को माननीय का दर्जा हासिल हो गया है। वह बिहार के राज्यपाल बनाए गए हैं। उनकी खाली सीट पर फिर से सियासी कब्जे को लेकर तकरार जारी है। पिछले चुनाव में सुधाकर सिंह ने बीजेपी को कड़ी टक्ककर दिया था लेकिन विरादरी की बहुलता के चलते उन्हें पराजित होना पड़ा। इस बार फिर बीजेपी उम्मीदवार और निर्दलीय सुधाकर के बीच सीधी टक्कर है। इस बार भी विरादरी की बहुलता और सत्ता की सफलता के सहारे बाजी मारने का मंसूबा बीजेपी के प्रत्याशी ने पाल रखा है। लेकिन इस बार समीकरण बदल गया है और घोसी की जली-भुनी जनता ने निर्दल के समर्थन में फतवा जारी कर दिया है। इसीलिये तो सियासत के तराजू पर अभी भी निर्दलीय सुधाकर भारी हैं। घोसी विधानसभा में इस बार वरासत की सियासत फेल होती नजर आ रही है। मतदाता अपने भाग्य बिधाता के चयन में पूरी पारदर्शिता बरत रहा है।

बीते साल की भूल को घोसी की जनता फिर से दोहराना नहीं चाह रही है। घोसी की बंजर होती धरती पर विरादरी वाद की जातिवादी हवा इतना खतरनाक साबित हो रही है कि विकास की गंगा इसके भयानक गर्मी से बारहो महीने सूखी है। जिसकी तलहटी में भ्रष्टाचार अनहद अट्टाहास कर रही है। इसी के चलते बहुमत में जनता के बीच आक्रोश का लावा उबल रहा है जो चुनाव के सियासी बरसात में नमी पाकर कभी भी उबल सकता है। वादा खिलाफी के आवरण में अच्छे दिन की बात करते करते सत्ता हथिया लेने की चालाकी को लेकर देश मे विद्वेश की बढ़ती व्यवस्था पर लोग अफसोस कर रहे हैं। कोई नृप होहिं हमें का हानी। पर बहस शुरू है

वादा तेरा वादा झूठा है तेरा वादा.. वादे पर तेरे… इस बात पर चर्चा आम हो गयी है। आज यह उपचुनाव प्रदेश की सियासती व्यवस्था का उदाहरण बनने जा रहा है। जो अगले चुनावी सियासी पुस्तक का प्रस्तावना होगा !
सरकार के ढपोर शंखी व्यवस्था में भ्रष्टाचार की बढ़त से आस्था बुरी तरह प्रभावित है। चाहत आहत है। घोसी विकास के लिये तरस रहा है। यहां विकास का बादल दशकों से नहीं बरस रहा है। घोसी की सियासती खेती में लमेरा फसल पैदावार में आ गयी जो घोसी की ऊर्वरा मिट्टी को जहरीला बना दिया? अपने ही कर्मो से बर्बादी की इबारत लिखने को लेकर मतदाता अफसोस कर रहा है। लगातार तबाही का दिन देखने के बाद पब्लिक अपने बीच एक ऐसा रहनुमा की तलाश कर रही है जो घोसी की आवाज को गर्मजोशी के साथ विधानसभा में उठा सके। घोसी की पुरानी मर्यादा को वापस ला सके। जहरीली पैदावार से निजात दिला सके।
इस बार के चुनाव में घोसी की जनता जागरुक हो गई है। अच्छे दिन की आस देखते उसकी आंखें थक चुकी हैं और जात-पात का सियासी खेल खत्म होता नजर आ रहा है। सारे सियासी फैक्टर फेल हो गये हैं आने वाला कल विहंगम नजारा पेश करने की ओर शान्ति सद्भाव की मिसाल पेश करते हुए मन्द गति से मुस्कराते आगे बढ़ रहा है। व्यवस्था के बादल चमक-धमक के साथ सियासी आसमान पर कालिमा लिये उमड़-घुमड़ रहे हैं।

बरसते है या झंझावाती विरोध की हवा में उड़ जाते है। घोसी के लोग सियासत की वरासत करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। बस लोग डर रहे हैं कि कहीं सियासत की सुनामी में चाहत की बस्ती न डूब जाए। मतदाता इस बार अपने महबूब रहनुमा को खूब पहचान रहा है जान रहा है। यह जानते हूए भी कि हम जानते है तुझे चाहने से कुछ हासिल नहीं होगा फिर भी न जाने क्यों तुझे चाहने को दिल चाहता है।वास्तविकता के धरातल पर सच्चाई की इबारत लिखने के लिये समय का चक्र फक्र से घोसी के सियासी चुनाव के फैसले का इन्तजार कर रहा है। वर्तमान व्यवस्था के बीच जहां समरसता कटुता से दूरी बनाकर चल रही है वही सियासत वरासत के लिये साम, दाम, दंड और भेद का सूत्र अख्तियार कर रही है। मतदान का समय जैसे-जैसे करीब आ रहा है मतदाता समझदार होता नजर आ रहा है। सभी उम्मीदवार अपने व्यवहार, अपनी पार्टी कमाई की पैदावार को लेकर मचल रहे हैं। वहीँ मतदाता रोज अपना सियासी ठीकाना बदल रहे हैं। निर्दलीय उम्मीदवार भी बर्षो से सियासत की खेती में अगेती फसल बोते रहे हैं।

आज उसी की बदौलत खूबसूरत सियासी आशियाना बनाकर टहल रहे हैं। जवाबी हमला एक दूसरे पर बराबर जारी है और लखनऊ जाने की भरपूर तैयारी हो चुकी है। सत्ता के सुखभोगियों की नींद हराम हो गयी है। समय से पहले ही उनकी शाम हो गयी है। कल क्या होगा यह तो कहना मुश्किल है लेकिन मतदाताओं के पास तो सारे समस्या का हल है। समय करीब आ रहा है। सियासती कम्पास जगह बदल रहा है। आखिर बाजी कौन मारता है? कौन जीतता है? कौन हारता है? इसका विश्लेषण अभी तक अनुमानों पर ही आधारित है। यहां के उम्मीदवार तो कुछ आयातित है कुछ संस्कारित है। इन्हीं के बीच होना है फैसला। बस बनाये रखिये हौसला बहुत ही कम रह गया है अब फासला।
साभार – जगदीश सिंह, वरिष्ठ पत्रकार