गायत्री परिवार ज्वाज्वल्यमान सूर्य की भांति फिर सामने आएगा। कोई भी पूज्यवर आचार्य श्रीराम शर्मा और उनकी दिव्य संस्था की निष्कलंकता पर सन्देह न करे। ये बातें हैं आल इंडिया जर्नलिस्ट यूनियन के संरक्षक राम महेश मिश्र की।

बेहद तकलीफ़देह स्थितियाँ।
ओफ़्फ़ो…!!! हे राम…!!!
ज़िन्दगी में यही दिन देखने बाक़ी थे।

वरिष्ठ गुरुभ्राता श्री जितेन्द्र रघुवंशी ने शान्तिकुंज के वर्तमान शर्मनाक प्रसंग पर जो सधी हुई टिप्पणी की है वह समसामयिक है, वेशक़ीमती है। इस समय बड़े संयम से काम लेकर दूध का दूध और पानी का पानी अलग होना ही चाहिए। हमारा गुरुद्वारा सभी प्रकार के विवादों से हमेशा मुक्त रहे, प्रभु से हमारी यही प्रार्थना है।

हमारे गुरुवर निष्कलंक थे, निष्कलंक हैं और सदा-सर्वदा निष्कलंक रहेंगे। पावन गुरुसत्ता की युग निर्माण योजना कोई मानवी योजना नहीं बल्कि वस्तुतः दैवीय योजना है, वह अपना उज्ज्वल स्वरूप लेकर निखरेगी तथा उसकी चमक और अधिक बढ़ी हुई हम लोग देखेंगे, यह दुनिया देखेगी।

ईश्वर की दैवीय योजनायें व्यक्ति या व्यक्तियों से बहुत ऊँची होती हैं। ज़रूरत है कि इन दिनों हम सब अपने सदगुरुदेव और उनके विचार क्रांति अभियान की अच्छाइयों व सच्चाइयों को समाज-देश-विश्व के सम्मुख अधिकाधिक लाएँ, एकजुट रहें तथा ‘सत्प्रवृत्ति संवर्धन व दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन’ दोनों पर साथ-साथ ध्यान दें। हम सब इस कार्य में भीतर से संलग्न हैं। हमारे गुरु-भाई-बहिनें, देश व विदेश में सेवारत गायत्री परिजन कृपया ध्यान रखें – “दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के बिना सत्प्रवृत्ति संवर्धन छलनी में दूध दुहने के समान होता है।” दोषी जो कोई भी हो उसे भारतीय न्याय विधान के अन्तर्गत कड़ा दण्ड दिया जाना चाहिए।

विश्वास किया जाना चाहिए कि अंधेरे छँटेंगे और पूर्ण सच्चाई के साथ इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य सामने आएगा। सभी दृढ़तापूर्वक संकल्प लें कि हम सब गुरुभक्त अपने परम तपस्वी, महान विचारक व लेखक एवं युगदृष्टा प्रातः स्मरणीय पूज्य गुरुदेव और युगपरिवर्तनकारी उनके अद्वितीय वैचारिक अभियान को न तो किंचित मन्द पड़ने देंगे और न ही कदाचित शिथिल होने देंगे।

‘प्रासंगिक विशेष लेख’

सोना तपने के बाद और भी अधिक चमकता है:-
पिछले तीन दिनों से गायत्री परिवार के केन्द्र हमारे गुरुद्वारे की गरिमा को गिराने के लिए सोशल मीडिया के द्वारा बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे समय में गुरुभाई बहनों का आक्रोशित होना निश्चित रूप से स्वाभाविक ही है, पर हम सोशल मीडिया में जिस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं यह भूल जाते हैं कि हम परम पूज्य गुरुदेव पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के शिष्य हैं।
सन 1986 में भी गायत्री परिवार के लिए इसी तरह का एक संक्रमण काल आया था। परम पूज्य गुरुदेव के ऊपर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे थे। हम लोग भी आक्रोशित थे, परम पूज्य गुरुदेव से कहा गया कि आपके ऊपर सैकड़ों निराधार आरोप लगाए जा रहे हैं, आप हमें आज्ञा दीजिए। हम आरोप लगाने वाले पर देशभर में मुकदमे डलवाते हैं।
परम पूज्य गुरुदेव ने सायंकाल वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की एक बैठक बुलाई और मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा कि इन झंझावातों से तुम लोगों को परेशान नहीं होना चाहिए। गुरुदेव ने आगे कहा कि मैंने शान्तिकुँज को सृजन सैनिकों की छावनी बनाई है। देशभर से हीरे मोती चुन चुन कर मैंने एक सूत्र में पिरोया है। मैंने कार्यकर्ताओं की अच्छाइयां देखी हैं और उन्हीं का उपयोग किया है। मुझे तो केवल युग निर्माण का लक्ष्य दिखाई पड़ रहा है। तुम लोगों को भी आरोपों प्रत्यारोपों के जंजाल में नहीं पड़ना चाहिए।
गुरुदेव ने आगे कहा सूर्य को कोई कैसे बदनाम कर सकता है? असली को कभी बदनामी का भय नहीं होता। हमारा यह मिशन सूर्य के समान है। इसकी कोई क्या बदनामी करेगा? जो असली युग निर्माणी होगा वह इन आरोप-प्रत्यारोपों को दरकिनार करके अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता चला जाएगा, उसे मान और अपमान कभी प्रभावित नहीं करेंगे। इस संदर्भ में मैं तुम्हें एक दृष्टांत महर्षि दयानंद का सुनाता हूं।
“बात उन दिनों की है जब महर्षि दयानंद ने तत्कालीन समाज में व्याप्त अंधविश्वासों के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभाल लिया था। प्रबुद्ध वर्ग उनके तर्क, तथ्य पूर्ण प्रतिपादनों से प्रभावित होकर अंधविश्वास के विरुद्ध एकजुट होने लगा था। इससे तथाकथित रूढ़िवादी पंडितों की नींद हराम हो गई थी। वह तरह तरह से महर्षि दयानंद को बदनाम करने के लिए तथा उनके अनुयायियों को हतोत्साहित करने का षड्यंत्र रचते रहा करते थे।”
“एक दिन तो उन पंडितों ने महर्षि दयानंद की प्रतिमा बनाई तथा एक अर्थी सजाकर उसमें उस प्रतिमा को लिटाया और उन्हीं के आश्रम के सामने से राम नाम सत्य है का उद्घोष करते हुए निकल रहे थे। यह सब महर्षि दयानंद के शिष्यों को अच्छा नहीं लगा। वे महर्षि के पास गए और कहने लगे, यह तो उद्दंडता की पराकाष्ठा है, हमसे अब सहन नहीं होता है। आप आज्ञा करें हम अभी इन्हें इस उद्दंडता का दंड देते हैं।”
“स्वामी जी ने पूछा आखिर तुम लोग इतने परेशान क्यों हो रहे हो? तभी एक शिष्य ने कहा गुरुदेव इन पंडितों ने आपकी नकली प्रतिमा बनाई है तथा अर्थी सजाकर आश्रम के सामने से जुलूस बनाकर हम लोगों को अपमानित करते हुए स्मशान की ओर जा रहे हैं।”
“यह सुनते ही स्वामी जी ने ठहाका लगाकर हंसते हुए कहा- तुम क्या कह रहे हो? नकली दयानंद की अर्थी निकाल रहे हैं। तत्काल ही आवेश भरे शब्दों में बोलते हुए कहते हैं- नकली दयानंद की अर्थी निकाली ही जानी चाहिए। नकली दयानंद की बदनामी होनी ही चाहिए। असली तो मैं तुम लोगों के सामने बैठा हूं, मेरी तो अभी अर्थी नहीं निकल रही, फिर तुम लोग इतना परेशान क्यों हो रहे हो? ऐसे सारगर्भित उत्तर की शिष्यों को कल्पना भी नहीं थी। सभी हतप्रभ रह गए।”
आगे परम पूज्य गुरुदेव ने कहा- कि किसी श्रेष्ठ कार्य की निंदा न हो तो उसका मूल्यांकन नहीं होता है। अंधकार न हो तो प्रकाश की अनुभूति कैसी? दुष्टता न रहे तो सज्जनता का मूल्यांकन कैसे हो सकता है? अतः गोस्वामी तुलसीदास जी की चौपाई को ध्यान में रखकर हमें अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में लिखा है- “खल परिहास होय हित मोरा, काक कहहिं कलकंठ कठोरा।” बच्चो ! अगले दिनों तुम लोगों को बहुत बड़े-बड़े कार्य करने हैं। बड़ी जिम्मेदारियां उठानी हैं। कौन क्या कह रहा है? कौन क्या कर रहा है? इसकी अनदेखी करके स्वयं लक्ष्य को पूरा करने के लिए क्या कर रहे हो मात्र यही चिंतन चलना चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप, मान-अपमान, प्रशंसा या बदनामी से विचलित न होते हुए अपने अपने पुरुषार्थ को तराशने में लग जाना चाहिए।”
वह ऐसा समय था कि सोशल मीडिया इतना सक्रिय नहीं था, इतनी घटिया पत्रकारिता भी नहीं थी, जो बिना तथ्यों के भी तिल का ताड़ बनाकर खड़ा कर दे। हम अपने आराध्य परम पूज्य गुरुदेव पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के द्वारा बनाई गई आचार संहिता से भटके जरूर हैं, ऐसा तो नहीं है कि यह विस्फोट अचानक हुआ हो। यह चिनगारी कब से सुलग रही थी? वरिष्ठों ने इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया? यह हम सभी के लिए आत्म समीक्षा का विषय है, किन्तु वर्तमान में हमारे गुरुद्वारे का जिस तरह से चीर हरण किया जा रहा है, हमारी संस्कृति के विरोधी जिस तरह हमारी संस्था का हथियार की तरह उपयोग कर रहे हैं, यह चिन्ता का विषय है।
अब तो कानूनी प्रक्रिया चल पड़ी है, पर जिस तरह से हमारे गुरु भाई बहनों के द्वारा बिना सोचे समझे, गाली गलौज के साथ सोशल मीडिया पर गंदगी को परोसा जा रहा है, अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वह अपनी गरिमा के अनुरूप नहीं है।
हमें यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि यह पवित्र संस्था तपोनिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी के पुरुषार्थ से भारतीय संस्कृति के ध्वज को समूचे विश्व में फहराने के लिए बनाई गई है। यह संस्थान पवित्र था, पवित्र है और पवित्र ही रहेगा। शान्तिकुंज परम पूज्य गुरुदेव का स्थूल शरीर है, शरीर में कोई फोड़ा भी हो जाता है तो उसका समय पर इलाज किया जाना चाहिए था, उसे कैंसर बनने दिया गया, अब तो आपरेशन की प्रक्रिया चल पड़ी है, योग्य चिकित्सकों को अपना कार्य करने दें, हां, आपरेशन सफल हो, इसके लिए अपनी भूमिका जरूर तय कर सकते हैं।
प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने के लिए परम पूज्य गुरुदेव ने एक ही मार्ग दिखाया है, और वह अचूक भी है, हममें से कई गुरु भाई बहन प्रत्यक्ष दृष्टा भी होंगे, जब स्काई लैब के गिरने से भारी तबाही का भय वैज्ञानिकों ने दिखाया था, तब परम पूज्य गुरुदेव ने स्काई लैब साधना कराई थी। उसका चमत्कारी परिणाम हम लोगों ने देखा है। क्यों न हम भी आज से ही ५ माला गायत्री मंत्र का तथा एक माला महामृत्युंजय मंत्र का जप आरंभ कर दें और सच्चाई की जीत के लिए परम पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना करें। सोशल मीडिया तथा गुरुद्वारा की गरिमा गिराने वाले माध्यमों से दूर रह कर यदि हम लोग भावपूर्ण प्रार्थना करेंगे तो निश्चित रूप से हम गुरुदेव के सच्चे शिष्य कहलाने के अधिकारी होंगे।
-जितेन्द्र रघुवंशी, प्रज्ञाकुञ्ज,हरिद्वार